Sunday, 17 February 2013

लाल किताब में शुक्र ग्रह (Shukra Graha in Lal Kitab)

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लाल किताब के अनुसार शुक्र ग्रह की कुण्डली में शुभ स्थिति जीवन को सुखमय और प्रेममय बनाती है तो अशुभ स्थिति चारित्रिक दोष एवं पीड़ा दायक होती है.
शुक्र को सबसे चमकीला और सुन्दर ग्रह कहा गया है.यह संध्या काल में एवं प्रात: काल में चमकने वाला ग्रह है.लाल किताब में इसे प्रेम और वासना का अधिपति माना गया है.कुण्डली में इसकी शुभ स्थिति जीवन को सुखमय और प्रेममय बनाती है तो अशुभ स्थिति चारित्रिक दोष एवं पीड़ा दायक होती है.
लाल किताब के अनुसार 7 वां घ्रर जिसे वैदिक ज्योतिष में प्रेम और जीवनसाथी का घर कहा गया है उसका स्वामी शुक्र होता है.शुक्रवार का अधिपति शुक्र होता है.यह बुध, शनि और केतु का मित्र और सूर्य, चन्द्र एवं राहु से शत्रुता रखता है.मंगल और बृहस्पति के साथ इसका वैर होता है.टेवे में 2, 3, 4, 7 एवं 12 वें खाने में शुक्र श्रेष्ठ होता है जबकि 1, 6, 9 वें खाने  में मंदा होता है.मीन राशि में यह उच्च होता है और कन्या में नीच.मिथुन राशि में यह योग कारक होता है.सप्तम भाव में यह जिस ग्रह के साथ सम्बन्ध बनाता है उसे अपना प्रभाव दे देता है.
शुक्र को परिवार और गृहस्थी का कारक माना गया है.पुरूष की कुण्डली में यह पत्नी और स्त्री की कुण्डली में पति की स्थिति को दर्शाता है.लाल किताब कहता है कि यह कुण्डली में अकेला होने पर अहित नहीं करता है और इससे प्रभावित व्यक्ति किसी को परेशान नहीं करता है.टेवे में सातवें खाने में शुक्र, शनि एवं सूर्य की युति होने पर सूर्य मंदा होता है एवं शुक्र भी अशुभ हो जाता है.इस स्थिति में धन की हानि होती है एवं पिता से अच्छे सम्बन्ध नहीं रह पाते हैं.शुक्र जब बारहवें घर में होता है तब धन और उच्चपद प्रदान करता है.

शरीर में जननांग, वीर्य, नेत्र पर शुक्र का प्रभाव रहता है.शुक्र प्रेम, विवाह, वासना, मैथुन, सुख, ऐश्वर्य, गायन एवं नृत्य का अधिपति होता है.शुक्र विवाह एवं वैवाहिक सुख सहित सम्बन्ध विच्छेद का भी कारक होता है.शुक्र प्रभावित व्यक्ति आशिक मिज़ाज का होता है.सुन्दरता एवं कला का प्रेमी होता है.जिस पुरूष की कुण्डली में शुक्र शुभ और उच्च का होता है वह श्रृंगार प्रिय होता है.इन्हें स्त्रियों का साथ पसंद होता है व इनसे लाभ भी मिलता है.
शुक्र अशुभ होने पर व्यक्ति में चारित्रिक दोष होता है.मंदा शुक्र पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन में अशांति और कलह पैदा करता है.त्वचा सम्बन्धी रोग, स्वप्न दोष.अंगूठे में अकारण पीड़ा मंदे शुक्र की निशानी कही गयी है.
लाल किताब में शुक्र का उपाय (Lalkitab Remedies for Shukra)
लाल किताब में प्रत्येक भाव में शुक्र की शुभता एवं उपचार सम्बन्धी उपाय बताए गये हैं.शुक्र की शुभता के लिए कुछ सामान्य उपायों में पत्नी का सम्मान करना चाहिए.शुक्रवार का व्रत करना चाहिए.मन और हृदय पर काबू रखना चाहिए और भटकाव की ओर जाने से रोकना चाहिए.सात प्रकार के अनाज और चरी का दान करना चाहिए.चतुर्थ भाव में शुक्र मंदा होने पर पत्नी से दो बार शादी करनी चाहिए.धन एवं संतान के लिए स्त्री को बालों में सोने की क्लिप या सूई लगाकर रखना चाहिए.खाना नम्बर 6 में शुक्र मंदा होने पर संतान हेतु अंगों को दूध से धोना चाहिए.लाल किताब शुक्र के सम्बन्ध में मन और इन्द्रियों को नियंत्रित रखने पर विशेष बल देता है.

दैनिक - ज्योतिष (Daily Astrology)

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हम में से अधिकतर व्यक्ति अपने भविष्य के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं. यद्यपि उनमें से बहुत से लोगों का ज्योतिष में विश्वास नहीं होता फिर भी कौतहुल वश या शौक के कारण वो अपना दैनिक राशीफल पढ्ते है.
इसे हम ज्योतिष का चमत्कार ही कहेंगे कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में इस विद्या की आलोचना या खण्डन करते हैं, वो अपने निजी जीवन में इसके प्रति आकर्षण रखते हैं. यह दोहरा चरित्र उन व्यक्तियों का स्वंय का है, ज्योतिष शास्त्र का नहीं.
हम यहाँ दैनिक ज्योतिष (Daily Astrology) की चर्चा करेंगे. दैनिक ज्योतिष का आधार गोचर होता है. उस दिन विशेष में ग्रह किन-किन राशियों में भ्रमण कर रहे हैं एंव किस प्रकार मनुष्य पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, इन सभी बातों का विश्लेषण दैनिक ज्योतिष में किया जाता है. वैसे तो दैनिक ज्योतिष की विवेचना विभिन्न दृष्टिकोणो से की जा सकती है परन्तु हम यहाँ सिर्फ उन्ही बिन्दुओ पर प्रकाश डालेंगे जोकि सबसे अधिक महत्वपुर्ण है. पहले तरीके के माध्यम से दैनिक ज्योतिष को पढ्ने के लिए व्यक्ति का नाम मालूम होना चाहिए . फिर यह ज्ञात करना चाहिए कि उस दिन चन्द्रमा किस राशी में है, अब व्यक्ति के नाम का चन्द्र राशी से सामन्जस्य बैठाना चाहिए, जिससे कि यह पता चल सके कि आज का दिन उसके लिए अनुकूल है या प्रतिकूल.

सामान्य तौर पर हम व्यक्ति के प्रसिद्ध नाम को ही लेते हैं परन्तु मेरे विचार से सही फलादेश जानने के लिए व्यक्ति के जन्म नाम या जन्म राशी की गणना ही करनी चाहिये. दैनिक ज्योतिष चिरकाल से ग्रहो का गोचर चन्द्रमा को आधार मान कर ही देखा जाता है. शनि की साढेसती और ढैया तो चन्द्रमा से ही मानी जाती है तथा राहु-केतु का गोचरवश चन्द्र से भ्रमण ही ग्रहण की स्थिति बनाता है.

जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं कि दैनिक ज्योतिष को देखने के विविध दृष्टिकोण है. एक अन्य दूसरे प्रकार में हम् चन्द्र राशी और दिन के योग से होने वाले परिणाम की व्याख्या करेंगे. इस तरह के दैनिक राशीफल में देखा जाता है कि चन्द्रमा जिस राशी में है उसका तत्व कौन सा है, अर्थात मान लो चन्द्रमा गोचरवश मेष राशी से भ्रमण कर रहा है, तो मेष राशी अग्नि प्रधान होती है तथा उस दिन कौन सा वार है, मान लो उस दिन रविवार है तो सुर्य भी अग्नि तत्व से है. अब चन्द्र और वार दोनो का तत्व अग्नि होने से दिन शुभ है. इसी प्रकार अन्य राशी एंव वार से बनने वाले योग का विश्लेषण भी कर सकते हैं.
यात्रा प्रकरण में दैनिक राशीफल का महत्वपुर्ण योगदान है. सम्मुख चन्द्र को यात्रा में बहुत ही शुभ माना जाता है. तथा पिछे वाले चन्द्रमा को अशुभ जैसे कि मान लो किसी दिन चन्द्रमा मिथुन राशी में भ्रमण कर रहा है, मिथुन राशी पश्चिम दिशा की सूचक है तो जो व्यक्ति उस दिन पश्चिम दिशा की यात्रा करेंगे उनकी यात्रा सुखमय होगी तथा जो व्यक्ति पुर्व दिशा की ओर गमन करेंगे उन्हें कष्टो का सामना करना पड सकता है. इसी प्रकार अन्य चन्द्रराशी से विचार करेंगे. यात्रा के सम्बन्ध में एक बात विशेष रुप से ध्यान देने योग्य है कि शुभता- अशुभता रुपी अन्तिम फल जन्मकुण्डली की स्थिति से ज्ञात किया जायेगा.

आपकी कुंडली में शुभ योग (Shubh Yoga in your Kundli)

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कुछ ग्रह योग अशुभ माने जाते हैं जो व्यक्ति के जीवन का सुख चैन छीन लेते हैं तो कुछ ऐसे शुभ ग्रह हैं जो व्यक्ति का जीवन संवार देते हैं। ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि.
ज्योतिष विधा ग्रह और उनके योगों के आधार पर फल का ज्ञान देता है। कुछ ग्रह योग अशुभ माने जाते हैं जो व्यक्ति के जीवन का सुख चैन छीन लेते हैं तो कुछ ऐसे शुभ ग्रह हैं जो व्यक्ति का जीवन संवार देते हैं। ज्योतिषशास्त्र में बताये गये कुछ उत्तम योग हैं महालक्ष्मी योग, नृप योग आदि.
महान योगों में महालक्ष्मी योग (Mahalakshmi Yoga)  धन और एश्वर्य प्रदान करने वाला योग है। यह योग कुण्डली Kundli में तब बनता है जब धन भाव यानी द्वितीय स्थान का स्वामी बृहस्पति एकादश भाव में बैठकर द्वितीय भाव पर दृष्टि डालता है। यह धनकारक योग (Dhan Yoga) माना जाता है। इसी प्रकार एक महान योग है सरस्वती योग (Saraswati Yoga) यह तब बनता है जब शुक्र बृहस्पति और बुध ग्रह एक दूसरे के साथ हों अथवा केन्द्र में बैठकर एक दूसरे से सम्बन्ध बना रहे हों। युति अथवा दृष्टि किसी प्रकार से सम्बन्ध बनने पर यह योग बनता है। यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है उस पर विद्या की देवी मां सरस्वती की कृपा रहती है। सरस्वती योग वाले व्यक्ति कला, संगीत, लेखन, एवं विद्या से सम्बन्धित किसी भी क्षेत्र में काफी नाम और धन कमाते हैं।

नृप योग (Nrup Yoga)  नाम से ही ज्ञात होता है कि यह जिस व्यक्ति की कुण्डली Kundli  में बनता है वह राजा के समान जीवन जीता है। इस योग का निर्माण तब होता है जब व्यक्ति की जन्म कुण्डली में तीन या उससे अधिक ग्रह उच्च स्थिति में रहते हैं। अमला योग (Amla Yoga) भी शुभ और महान योगों में से माना जाता है। यह योग तब बनता है जब जन्म पत्रिका में चन्द्रमा से दशम स्थान पर कोई शुभ ग्रह स्थित होता है। इस योग के साथ जन्म लेने वाला व्यक्ति अपने जीवन में धन, यश और कीर्ति हासिल करता है।
गजकेशरी योग  (Gajkesari Yoga) को असाधारण योग की श्रेणी में रखा गया है। यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में उपस्थित होता है उस व्यक्ति को जीवन में कभी भी अभाव नहीं खटकता है। इस योग के साथ जन्म लेने वाले व्यक्ति की ओर  धन, यश, कीर्ति स्वत: खींची चली आती है। जब कुण्डली में गुरू और चन्द्र पूर्ण कारक प्रभाव के साथ होते हैं तब यह योग बनता है। लग्न स्थान में कर्क, धनु, मीन, मेष या वृश्चिक हो तब यह कारक प्रभाव के साथ माना जाता है। हलांकि अकारक होने पर भी फलदायी माना जाता परंतु यह मध्यम दर्जे का होता है। चन्द्रमा से केन्द्र स्थान में 1, 4, 7, 10 बृहस्पति होने से गजकेशरी योग बनता है। इसके अलावा अगर चन्द्रमा के साथ बृहस्पति हो तब भी यह योग बनता है।
पारिजात योग (Parijat Yoga) भी उत्तम योग माना जाता है लेकिन इस योग की विशेषता यह है कि यह जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है वह जीवन में कामयाबी और सफलता के शिखर पर पहुंचता है परंतु रफ्तार धीमी रहती है यही कारण है कि मध्य आयु के पश्चात इसका प्रभाव दिखाई देता है। पारिजात योग का निर्माण तब होता है जबकि जन्म पत्रिका में लग्नेश जिस राशि में होता है उस राशि का स्वामी कुण्डली में उच्च स्थान पर हो या अपने घर में हो।
छत्र योग (Chhatra Yoga) जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका Kundli  में होता है वह व्यक्ति जीवन मे निरन्तर प्रगति करता हुए उच्च पद प्राप्त करता है। इस भगवान की छत्र छाया वाला योग कहा जा सकता है यह योग तब बनता है तब कि कुण्डली Kundli  में चतुर्थ भाव से दशम भाव तक सभी ग्रह मौजूद हों या फिर दशम भाव से चतुर्थ भाव तक सभी ग्रह स्थित हों। तीन भावों में दो दो ग्रह हों तथा तीन भावों में एक एक ग्रह स्थित हों तब शुभ योग बनता है जो नन्दा योग (Nanda Yoga)  के नाम से जाना जाता है। यह योग जिस व्यक्ति की जन्म पत्रिका में होता है वह स्वस्थ एवं दीर्घायु होता है। इस योग से प्रभावित व्यक्ति का जीवन सुखमय रहता है।
इसी प्रकार के कई अन्य योग हैं जिनकी मौजूदगी से व्यक्ति का जीवन सुखमय व आनन्दित रहता है और व्यक्ति यश एवं कीर्ति हासिल करता है।


हस्तरेखा से जानिए अपना भाग्य (Know your fortune through Palmistry)

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गर्भावस्था के दौरान ही शिशु के हाथ में लकीरो का जाल बुन जाता है, जो कि जन्म से लेकर मृत्यु तक रेखाओ के रुप में विद्यमान रहता है। इसे हस्त रेखा (Palm line) के रुप में जाना जाता है। सामान्यतया 16 वर्ष तक की आयु के बच्चो की हाथों की रेखाओ में परिवर्तन होता रहता है।
सोलह वर्ष की आयु होने पर मुख्य रेखाएँ (जीवन रेखा, भाग्य रेखा इत्यादि) (Life line, Fortune line) स्थिर हो जाती है तथा कर्मो के अनुसार अन्य छोटे-बडे परिवर्तन होते रहते हैं। तथा ये परिवर्तन जीवन के अंतिम क्षण तक होते रहते हैं (Life line keep on changing throughout life)।
चूंकि हस्त रेखा (Samudrik Shastra)
विज्ञान कर्मो के आधार पर टिका है, इसलिए मनुष्य जैसे कर्म करता है वैसा ही परिवर्तन उसके हाथ की रेखाओ में हो जाता है (Palmistry stand by our work, palm line change with them)। हाथ का विश्लेषण करते समय सबसे पहले हम हाथ की बनावट को देखते हैं तत्पश्चात यह देखा जाता है कि हाथ मुलायम है या सख्त।आम तौर पर पुरुषो का दायाँ हाथ तथा स्त्रियों का बायाँ हाथ देखा जाता है।यदि कोइ पुरुष बायें हाथ से काम करता है तो उसका बायाँ हाथ देखा जाता है। हाथ में जितनी कम रेखाऎं होती हैं, भाग्य की दृष्टि से हाथ उतना ही सुन्दर माना जाता है (Lots of Palm line are not good for Fortune)।

हाथ में मुख्यतः चार रेखाओ का उभार स्पष्ट रुप से रहता है( We can see four main line in palm)
जीवन रेखा (Life Line)
जीवन रेखा हृदय रेखा के ऊपरी भाग से शुरु होकर आमतौर पर मणिबन्ध पर जाकर समाप्त हो जाती है (Life line start from heart line and end on Manibandh line)। यह रेखा भाग्य रेखा के समानान्तर चलती है, परन्तु कुछ व्यक्तियो की हथेली में जीवन रेखा हृदय रेखा में से निकलकर भाग्य रेखा में किसी भी बिन्दु पर मिल जाती है।जीवन रेखा तभी उत्तम मानी जाती है यदि उसे कोइ अन्य रेखा न काट रही हो तथा वह लम्बी हो इसका अर्थ है कि व्यक्ति की आयु लम्बी होगी तथा अधिकतर जीवन सुखमय बीतेगा। रेखा छोटी तथा कटी होने पर आयु कम एंव जीवन संघर्षमय होगा(If there is breakage in life line or there is any cut it means your life is short and in struggle)।

भाग्य रेखा:(Fate Line)
हृदय रेखा के मध्य से शुरु होकर मणिबन्ध तक जाने वाली सीधी रेखा को भाग्य रेखा कहते हैं (Straight Line start from middle of heart and end on Manibandh line called fate line) ।स्पष्ट रुप से दिखाई देने वाली रेखा उत्तम भाग्य का घौतक है।यदि भाग्य रेखा को कोइ अन्य रेखा न काटती हो तो भाग्य में किसी प्रकार की रुकावट नही आती।परन्तु यदि जिस बिन्दु पर रेखा भाग्य को काटती है तो उसी वर्ष व्यक्ति को भाग्य की हानि होती है।कुछ लोगो के हाथ में जीवन रेखा एंव भाग्य रेखा में से एक ही रेखा होती है।इस स्थिति में वह व्यक्ति आसाधारण होता है, या तो एकदम भाग्यहीन या फिर उच्चस्तर का भाग्यशाली होता है (If there is no fortune line on your palm it means you are not a middle class)। ऎसा व्यक्ति मध्यम स्तर का जीवन कभी नहीं जीता है।
हृदय रेखा: (Heart Line)
हथेली के मध्य में एक भाग से लेकर दूसरे भाग तक लेटी हुई रेखा को हृदय रेखा कहते हैं (Vertical line starts from middle of palm and end on heart line called heart line)। यदि हृदय रेखा एकदम सीधी या थोडा सा घुमाव लेकर जाती है तो वह व्यक्ति को निष्कपट बनाती है। यदि हृदय रेखा लहराती हुई चलती है तो वह व्यक्ति हृदय से पीडित रहता है।यदि रेखा टूटी हुई हो या उस पर कोइ निशान हो तो व्यक्ति को हृदयाघात हो सकता है(There is Chance of heart attack if heart line is break)।
मस्तिष्क  रेखा:(Brain Line)
हथेली के एक छोर से दूसरे छोर तक उंगलियो के पर्वतो तथा हृदय रेखा के समानान्तर जाने वाली रेखा को मस्तिष्क रेखा  कहते हैं (Parallel line to heart line is called mind line)। यह आवश्यक नहीं कि मस्तिष्क रेखा एक छोर से दूसरे छोर तक (हथेली) जायें, यह बीच में ही किसी भी पर्वत (Planetary Mounts) की ओर मुड सकती है। यदि हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में न मिलें तो उत्तम रहता है (Brain line is good if mind line or heart line are not together)। स्पष्ट एंव बाधा रहित रेखा उत्तम मानी जाती है। कई बार मस्तिष्क रेखा एक छोर पर दो भागों में विभाजित हो जाती है। ऎसी रेखा वाला व्यक्ति स्थिर स्वभाव का नहीं होता है, सदा भ्रमित रहता है।
लाल किताब में सामुद्रिक ज्ञान यानी पामिस्ट्रि (Palmistry) के आधार पर व्यक्ति की जन्मकुण्डली का निर्माण होता है, तथा जिन व्यक्तियो को अपनी जन्मतिथि तथा जन्म समय मालूम नही उनके लिए लाल किताब बहुत लाभकारी है।

कन्या की कुण्डली में वैवाहिक स्थिति (Girls Kundali & Marriage Match Making)

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कन्या के माता पिता को अपनी पुत्री की शादी के सम्बन्ध में सबसे अधिक चिन्ता रहती है. कन्या भी अपने भावी जीवन, पति, ससुराल एवं उससे सम्बन्धित अन्य विषयों को लेकर फिक्रमंद रहती है.
ज्योंतिषशास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली का विश्लेषण सही प्रकार से किया जाए सभी विषयों की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है. 
जीवनसाथी
कन्या की शादी में सबसे अधिक चिन्ता उसके होने वाले पति के विषय में होती है कि वह कैसा होगा.  सप्तम भाव और सप्तमेश विवाह में महत्वपूर्ण होता है.  ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सप्तम भाव में शुभ ग्रह यानी चन्द्र, गुरू, शुक्र या बुध हो अथवा ये ग्रह सप्तमेश हों अथवा इनकी शुभ दृष्टि इस भाव पर होने पर कन्या का होने वाला पति कन्या की आयु से सम यानी आस पास होता है.  यह दिखने में सुन्दर होता है.  सूर्य, मंगल, शनि अथवा राहु, केतु सप्तम भाव में हों अथवा इनका प्रभाव इस भाव पर हो तब वर गोरा और सुन्दर होता है और कन्या से लगभग 5 वर्ष बड़ा होता है.  कन्या की कुण्डली में सूर्य अगर सप्तमेश है तो यह संकेत है कि पति सरकारी क्षेत्र से सम्बन्धित होगा.  चन्द्रमा सप्तमेश होने पर पति मध्यम कदकाठी का और शांति चित्त होता है.  सप्तमेश मंगल होने पर पति बलवान परंतु स्वभाव से क्रोधी होता है.  मध्यम कदकाठी का ज्ञानवान और पुलिस या अन्य सरकारी क्षेत्र में कार्यरत होता है.  सप्तम भाव में शनि अगर उच्च राशि का होता है तब पति कन्या से काफी बड़ा होता है और लम्बा एवं पतला होता है.  नीच का शनि होने पर पति सांवला होता है. 

जीवन साथी की आयु
लड़की की जन्मपत्री में द्वितीय भाव को पति की आयु का घर कहते हैं.  इस भाव का स्वामी शुभ स्थिति में होता है अथवा अपने स्थान से दूसरे स्थान को देखता है तो पति दीर्घायु होता है.  जिस कन्या के द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरू सप्तम भाव स्थित हो एवं द्वितीय भाव को देख रहा हो वह स्त्री भी सौभाग्यशाली होती है यानी पति की आयु लम्बी होती है. 
शादी की उम्र:
कन्या जब बड़ी होने लगती है तब माता पिता इस बात को लेकर चिंतित होने लगते हैं कि कन्या की शादी कब होगी.  ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से कन्या की लग्न कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी बुध हो और वह पाप ग्रहों से पीड़ित नहीं हो तो कन्या की शादी किशोरावस्था पार करते करते हो जाती है.  सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल हो और वह पाप ग्रहों से प्रभावित है तब भी शादी किशोरावस्था पार करते करते हो जाती है.  शुक्र ग्रह युवा का प्रतीक है.  सप्तमेश अगर शुक्र हो और वह पाप ग्रहों से दृष्टि हो तब युवावस्था में प्रवेश करने के बाद कन्या की शादी हो जाती है.  चन्द्रमा के सप्तमेश होने से किशोरावस्था पार कर कन्या जब यौवन के दहलीज पर कदम रखती है तब एक से दो वर्ष के अन्दर विवाह होने की संभावना प्रबल होती है.  सप्तम भाव में बृहस्पति अगर सप्तमेश होकर स्थित हो और उस पर पापी ग्रहों का प्रभाव नहीं हो तब विवाह समान्य उम्र से कुछ अधिक आयु में संभव है. 

Wednesday, 13 February 2013

मनः शांती - संत एकनाथांची एक कथा - sant eknaath marathi story manahshaanti

 एकदा संत एकनाथांना कोणी दोन प्रश्न विचारले. एक, त्याच्या स्वत:च्या भविष्याबध्दल, आणि दुसरा, एकनाथ स्वभावाने एवढे शांत आणि निर्द्वेषी कसे राहू शकतात याच्याबद्दल .

एकनाथ हसले; आणि, 'केंव्हातरी याची उत्तरे देईन', म्हणून त्यांनी सांगीतले.

काही दिवसांनी, एकनाथांची त्या गृहस्थाशी भेट झाली. तेंव्हा त्याला बाजूला नेऊन एकनाथ म्हणाले, "तुझ्या पहिल्या प्रश्नाचे उत्तर देण्याची वेळ आली आहे, कारण, दुर्दैवाने, तू आता आठ दिवसांच्या आत मरणार आहेस."
तो गृहस्थ सुन्न झाला, गोठला ! एकनाथ समोरून निघून गेले, तेंव्हा तो बधीर मनाने परतला. 

जगलो तर एकनाथांसारख्या संतांच्या सदिच्छेने जगू, अशी त्याला भावना निर्माण झाली.
ती त्याने सार्थ केली. आयुष्यातले आठ दिवस पूर्ण करून नवव्या दिवशी, एकनाथांच्या दर्शनाला तो गेला. एकनाथांना हात जोडून म्हणाला, "तुमच्या कृपेने वाचलो."
एकनाथ मान डोलवित म्हणाले, "आता मी तुम्हाला दुस-या प्रश्नाचे उत्तर देणार आहे. गेले आठ दिवस तुम्ही कसे वागलात ? इतरांच्यावर किती रागावलात?"
तो गृहस्थ उत्साहाने म्हणाला, "कसला हो रागावतो? अगदी छान, शांत आठ दिवस गेले. शांत म्हणजे, मरणाच्या भितीने बेचैन होतो, पण दुस-यावर रागावण्यासाठी ती बेचैनी नव्हती. घरात बायकोशी कधी भांडलो नाही. मुलांना मारले नाही. वाटायचे की, आता अखेरचे आठ दिवस उरले. बायका-मुले पुन्हा दिसणार नाहीत; त्यांना का दुखवावे? अहो, शेजा-याचे जमिनीवरून चार पिढयांचे भांडण होते. त्याला स्वत:च्या हाताने हवा तो तुकडा तोडून दिला. देणे होते ते देऊन टाकले. ज्यांच्याकडून येणे होते, त्यांच्यापैकी जे गरीब होते, त्यांचे येणे सोडून दिले. काही पैसे गमावले, पण शांती कमावली. खूप खूप शांत असे आठ दिवस त्या दृष्टीने गेले."

एकनाथ समोरच्या माणसाच्या पाठीवर हात थोपटून म्हणाले, 

"हे तुझ्या दुस-या प्रश्नाचे उत्तर. आठ दिवसांत जग सोडून जायचे आहे, अशा कल्पनेने मी सदाच वावरतो. म्हणून मी शांत वाटतो." 

मनातला देव ...........लेखिका : राजश्री (पुणे )

आज माझ्या लेकीची वार्षिक परीक्षा सुरु होणार होती. माझ्या सासूबाई तिला सहजच बोलून गेल्या कि, "जायच्या आधी देवाला नमस्कार कर म्हणजे देव तुला चांगली बुद्धी देईल. "

"आजी आज अस काय विशेष आहे कि मला आजच चांगल्या बुद्धीची गरज आहे? ती तर मला नेहमी लागणारच." माझी लेक म्हणाली.
"आग आज तुझी परीक्षा ना म्हणून म्हंटल." इति सासूबाई.
"हे बर आहे तुझ. आज कशाची तरी गरज म्हणून हात जोडायचे आणे मग गरज संपली कि विसरून जायचं. देवाला एक प्रकारे लाच देण मला नाही पटत."

लेकीच्या ह्या उत्तरावर मी मात्र खूप विचार करू लागले. मनुष्य स्वभाव कसा विचित्र आहे. गरज असेल तेंव्हा अगदी मन लावून आळवणी केली जाते आणि एकदा गरज संपली कि त्या देवाची आठवण पण राहत नाही. खरच अस का घडत असेल?
तसं पाहायला गेल तर आपल्या प्रत्येक कृतीचे चांगले वाईट परिणाम हे आपल्यालाच भोगावे लागतात. देव त्याच्यात काहीच मदत करू शकत नाही. हो फार फार तर हे परिणाम झेलायची ताकत देवू शकतो.
यस मला माझे उत्तर मिळाले होते.

मला शाळेत शिकलेले भूमितीचे एक तत्व आठवले, कोणीही जड वस्तू उचलायची असेल तर ३ खांबांचा आधार लागतो. ह्या तीनही खांबांची उंची आणि आकारमान सारखेच असावे लागते. हे तीनही खांब जमिनीत एका योग्य कोनात आणि योग्य अंतरात रोवायचे असतात. ह्यातला एकही खांब जरी नीट उभा राहिला नाही किंवा वेगळ्या आकारमानाचा असेल तर वस्तू नीट उचलली जाणार नाही. जितकी वस्तू जड तितकी उंची आणि कोन अधिक.
अगदी तसंच कुठलाही निर्णय घेताना ३ खांब मजबूत असावे लागतात. पहिला खांब म्हणजे आपले ज्ञान, दुसरा खांब म्हणजे आपले संस्कार आणि तिसरा खांब म्हणजे शांत मन. हे तीनही खांब जर का मजबूत असतील तर आपल्या कृतीचा काहीही परिणाम होवो आपण तो सहज स्वीकारू शकतो.
माझ्या लेकीचे उदाहरण घेतले तर अस समजेल कि परीक्षेत जर का तिला चांगले मार्क मिळवायचे असतील तर उत्तम ज्ञान आवश्यक आहे. ते ज्ञान नसेल तर ती कदाचित काहीही लिहिणार नाही पण तिच्या वरचे संस्कार तिला कॉपी नक्कीच करू देणार नाहीत. पहिले दोन्ही खांब मजबूत असतील पण शांत मन नसेल तरी सुद्धा परिणाम शून्य. म्हणूनच असे काही करणे गरजेचे राहील कि तिला शांत मनाने परीक्षेला सामोरे जाता येईल.

हे शांत मन कोणाला देवाची आराधना करून मिळते, तर कोणाला एक सुरेल तान घेवून. तर कोणी छानसे चित्रच काढेल तर कोणी अजून काही तरी करेल. माझ्या मते जी कृती करून मनाला शांतता मिळते ती कृती म्हणजेच देवाचे एक रूप असते. म्हणूनच माझी आजी कदाचित म्हणायची कि देव हा सगळी कडे व्यापलेला आहे.

मित्रांनो मी माझ्या लेकीला समजावून सांगितलेला देवाचा अर्थ बरोबर कि चूक तुम्हाला काय वाटत?
साभार - लेखिका : राजश्री (पुणे )