Sunday, 17 February 2013

क्या होता है राशि रत्न (What are Moonsign Gems)

राशि रत्न परिचय (Introduction to Moonsign Gemstones)
रत्नों के विषय में सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि यह क्या होता है. रत्न मूल रूप से जैविक और अजैविक तत्व है. तृणमणि (Amber), मूंगा (Coral), मोती (Pearl), हाथी दांत (Lvory)जैविक रत्न हैं. प्राकृतिक रत्न खनिज के रूप में पृथ्वी के गर्भ से प्राप्त होता है. रत्न जितना सुन्दर होता है उतना ही उत्तम कोटि का होता है. रत्नों का कठोर होना भी इसका एक गुण होता है.

रत्नो के प्रकाशीय गुण (The effect of gemstone colors)
रत्नों में अनेकों गुण होते हैं जिनमें प्रकाशीय गुण विशिष्ट स्थान रखता है. रत्नों के अंदर कई रंगों की आभा छिटकती रहती है जिसे गौर से देखने पर विशेष आभा और चमक का भी अनुभव होता है. रत्नों की जांच के समय इसमें मौजूद प्रकाशीय गुण भी सहायक होता है. इसी की सहायता से रत्नों की सत्यता ज्ञात की जाती है. 

रत्न पहचान विधि (How to recognize an effective gem)
रत्नों की जांच स्पेक्ट्रम द्वारा की जाती है. स्पेक्ट्रोमस्कोप में रत्नों से निकलने वाली रोशनी अलग अलग रंगों के स्पेक्ट्रम में बंट जाती है. इस विधि से रंग के माध्यम से रत्नों को पहचानना आसान हो जाता है. कुछ रत्न ऐसे भी हैं जिनमें प्राकृतिक रोशनी में और कृत्रिम रोशनी में अलग अलग आभा होती हैं. पुखराज की विशेषता है कि यह सूर्य की रोशनी में अधिक चमकीला नज़र आता है जबकि बल्ब की रोशनी में इसकी चमक कम हो जाती है. इसके विपरीत पन्ना और माणिक्य बल्ब की रोशनी में सूर्य के प्रकाश से अधिक चमकीला दिखाई देते हैं. हीरा एक ऐसा रत्न है जिसमें प्राकृतिक और कृत्रिम रोशनी दोनों में ही समान अभा रहती है.

रत्न तौलने का मात्रक (Measuring a gemstone)
जिस प्रकार द्रव्य पदार्थों को लीटर में तौला जाता है और अनाज और अन्य वस्तुओं को किलो में तौला जाता है उसी प्रकार रत्नों को भी तौल कर बेचा जाता है. वर्तमान समय में रत्नों को तौलने का मात्रक कैरेट है. पुराने जमाने में इसे तोला, माशा और रत्ती में तौला जाता है. वर्तमान कैरेट प्राणली के अन्तर्गत 200 मिलीग्राम का एक कैरेट होता है. सुनार द्वारा सोने की शुद्धता मापने की विधि में जिस 24 कैरेट, 22 कैरेट, 18 कैरेट सोने की बात की जाती है वह इस पद्धति से भिन्न है. यह मात्रा ज्वेलरी में सोने की मात्रा को दर्शाने के लिए होता है.

भाग्य और रत्न (Destiny and Gemstones)

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रत्नों में चमत्कारी शक्ति है जो ग्रहों के विपरीत प्रभाव को कम करके ग्रह के बल को बढ़ते है. आइये जानें कि भाग्य को बलवान बनाने के लिए रत्न किस प्रकार धारण करना चाहिए.
रत्नों की शक्ति (Power of Gemstones)
रत्नों में अद्भूत शक्ति होती है. रत्न अगर किसी के भाग्य को आसमन पर पहुंचा सकता है तो किसी को आसमान से ज़मीन पर लाने की क्षमता भी रखता है. रत्न के विपरीत प्रभाव से बचने के लिए सही प्रकर से जांच करवाकर ही रत्न धारण करना चाहिए. ग्रहों की स्थिति के अनुसार रत्न धारण करना चाहिए. रत्न धारण करते समय ग्रहों की दशा एवं अन्तर्दशा का भी ख्याल रखना चाहिए. रत्न पहनते समय मात्रा का ख्याल रखना आवश्यक होता है. अगर मात्रा सही नहीं हो तो फल प्राप्ति में विलम्ब होता है.

लग्न और रत्न (Ascendant And Gemstones)
लग्न स्थान को शरीर कहा गया है. कुण्डली में इस स्थान का अत्यधिक महत्व है. इसी भाव से सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विचार किया जाता है. लग्न स्थान और लग्नेश की स्थिति के अनुसार जीवन में सुख दु:ख एवं अन्य ग्रहों का प्रभाव भी देखा जाता है. कुण्डली में षष्टम, अष्टम और द्वादश भाव में लग्नेश का होना अशुभ प्रभाव देता है. इन भावों में लग्नेश की उपस्थिति होने से लग्न कमजोर होता है. लग्नेश के नीच प्रभाव को कम करने के लिए इसका रत्न धारण करना चाहिए.

भाग्य भाव और रत्न (Gemstones and Fortune)
जीवन में भाग्य का बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. भाग्य कमज़ोर होने पर जीवन में कदम कदम पर असफलताओं का मुंह देखना पड़ता है. भाग्य मंदा होने पर कर्म का फल भी संतोष जनक नहीं मिल पाता है. परेशानियां और कठिनाईयां सिर उठाए खड़ी रहती है. मुश्किल समय में अपने भी पराए हो जाते हैं. भाग्य का घर जन्मपत्री में नवम भाव होता है. भाग्य भाव और भाग्येश अशुभ स्थिति में होने पर नवमेश से सम्बन्धित रत्न धारण करना चाहिए. भाग्य को बलवान बनाने हेतु भाग्येश के साथ लग्नेश का रत्न धारण करना अत्यंत लाभप्रद होता है.

तृतीय भाव और रत्न (Gemstone for Third house)
जन्म कुण्डली का तीसरा घर पराक्रम का घर कहा जाता है. जीवन में भाग्य का फल प्राप्त करने के लिए पराक्रम का होना आवश्यक होता है. अगर व्यक्ति में साहस और पराक्रम का अभाव हो तो उत्तम भाग्य होने पर भी व्यक्ति उसका लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाता है. आत्मविश्वास का अभाव और अपने अंदर साहस की कमी महसूस होने पर तृतीयेश से सम्बन्धित ग्रह का रत्न पहना लाभप्रद होता है.

कर्म भाव और रत्न (Gemstone for Tenth House)
कर्म से ही भाग्य चमकता है. कहा भी गया है "जैसी करनी वैसी भरनी" ज्योतिष की दष्टि से कहें तो जैसा कर्म हम करते हैं भाग्य फल भी हमें वैसा ही मिलता है. भाग्य को पब्रल बनाने में कर्म का महत्वपूर्ण स्थान होता है. भाग्य भाव उत्तम हो और कर्म भाव पीड़ित तो इस स्थिति भाग्य फल बाधित होता है. कुण्डली में दशम भाव कर्म भाव होता है. अगर कुण्डली में यह भाव पीड़ित हो अथवा इस भाव का स्वामी कमज़ोर हो तो सम्बन्धित भाव स्वामी एवं लग्नेश का रत्न पहनाना मंगलकारी होता है.

रत्न और सावधानी (Gemstone Precautions)
रत्न धारण करते समय कुछ सावधानियों का ख्याल रखना आवश्यक होता है. जिस ग्रह की दशा अन्तर्दशा के समय अशुभ प्रभाव मिल रहा हो उस ग्रह से सम्बन्धित रत्न पहनना शुभ फलदायी नहीं होता है. इस स्थिति में इस ग्रह के मित्र ग्रह का रत्न एवं लग्नेश का रत्न धारण करना लाभप्रद होता है. रत्न की शुद्धता की जांच करवाकर ही धारण करना चाहिए धब्बेदार और दरारों वाले रत्न भी शुभफलदायी नहीं होते हैं. 

रत्नों द्वारा रोग का उपचार भाग एक (Gemstone Therapy part 1)

भूलने की बीमारी और रत्न चिकित्सा (Memory lapse and Gemstone)
इस रोग में बीती हुई बहुत सी घटनाएं अथवा बातें याद नहीं रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुण्डली में जब लग्न और लग्नेश पाप पीड़ित होते हैं तो इस प्रकार की स्थिति होती है.सूर्य और बुध जब मेष राशि में होता है और शुक्र अथवा शनि उसे पीड़ित करते हैं तो स्मृति दोष की संभावना बनती है.साढे साती के समय जब  शनि की महादशा चलती है उस समय भी भूलने की बीमारी की संभावना प्रबल रहती ह.रत्न चिकित्सा पद्धति के अनुसार मोती और माणिक्य धारण करना इय रोग मे लापप्रद होता है.
सफेद दाग़ और रत्न चिकित्सा(Leucoderma and Gem therapy)
सफेद दाग़ त्वचा सम्बन्धी रोग है.इस रोग में त्वचा पर सफेद रंग के चकत्ते उभर आते हैं.यह रोग तब होता है जब वृष, राशि में चन्द्र, मंगल एवं शनि का योग बनता है.कर्क, मकर, कुम्भ और मीन को जल राशि के नाम से जाना जाता है.चन्द्रमा और शुक्र जब इस राशि में युति बनाते हैं तो व्यक्ति इस रोग से पीड़ित होने की संभावना रहती है.बुध के शत्रु राशि में होने पर अथवा वक्री होने पर भी इस रोग की संभावना बनती है.इस रोग की स्थिति में हीरा, मोती एवं पुखराज धारण करने से लाभ मिलता है.
गंजापन और रत्न चिकित्सा( Baldness and Gem Therapy)
गंजापन बालों के झड़ने से सम्बन्धित रोग है.आनुवांशिक कारणों के अलावा यह रोग एलर्जी अथवा किसी अन्य रोग के कारण होता है.जिनकी कुण्डली के लग्न स्थान में तुला अथवा मेष राशि में स्थित होकर सूर्य शनि पर दृष्टि डालता है उन्हें गंजेपन की समस्या से पीड़ित होने की संभावना अधिक रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नीलम और पन्ना धारण करके इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है.
मधुमेह और रत्न चिकित्सा(Diabetes and Gem Therapy)
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मधुमेह यानी डयबिटीज का सामना उस स्थिति में करना होता है जबकि कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि में पाप ग्रहों की संख्या दो या उससे अधिक रहती है.लग्नपति के साथ बृहस्पति छठे भाव में हो तुला राशि में पाप ग्रहों की संख्या दो अथवा उससे अधिक हो तो इस रोग की संभावना बनती है.अष्टमेश और षष्ठेश कुण्डली में जब एक दूसरे के घर में होते हैं तब भी इस रोग का भय रहता है.रत्न चिकित्सा के अन्तर्गत इस रोग में मूंगा और पुखराज धारण करना लाभप्रद होता है.
दन्त रोग और रत्न ज्योतिष (Dental Problem and Gemstone)
दांतों का स्वामी बृहस्पति होता है.कुण्डली में बृहस्पति के पीड़ित होने पर दांतों में तकलीफ का सामना करना होता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बृहस्पति जब नीच राशि में होता है अथवा द्वितीय, नवम एवं द्वादश भाव में होता है तब दांत सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है.मूंगा और पुखराज इस रोग में लाभदायक होता है.लोहे का कड़ा घारण करना भी इस रोग में अनुकूल लाभ देता है.
नोट रत्न धारण करने से पहले किसी रत्न विशेषज्ञ की सलाह लेना लाभकारी रहता है. 

रत्नो द्वारा रोग का उपचार भाग-2 (Treating illnesses with Gemstones Part 2)

उच्च रक्तचाप और रत्न चिकित्सा (High Blood pressure and Gemstone Therapy)
चन्द्रमा हृदय का स्वामी है। चन्द्रमा के पीड़ित होने पर इस रोग की संभावना बनती है। जिनकी जन्मपत्री में सूर्य, शनि, चन्द्र, राहु अथवा मंगल की युति कर्क राशि में होती है उन्हें भी इस रोग की आशंका रहती है। पाप ग्रह राहु और केतु जब चन्द्रमा के साथ योग बनाते हैं तब इस स्थिति में व्यक्ति को उच्च रक्तचाप की समस्या का सामना करना होता है। मिथुन राशि में पाप ग्रहों की उपस्थिति होने पर भी यह रोग पीड़ित करता है। इस रोग की स्थिति में 8-9 रत्ती का मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है। चन्द्र के रत्न मोती, मूनस्टोन, ओपल भी मूंगा के साथ धारण करने से विशेष लाभ मिलता है।

तपेदिक और रत्न चिकित्सा (tuberculosis & Gemstone  Therapy)
तपेदिक एक घातक रोग है। नियमित दवाईयों के सेवन से इस रोग को दूर किया जा सकता है। अगर उपयुक्त रत्नों को धारण किया जाए तो चिकित्सा का लाभ जल्दी प्राप्त हो सकता है। ज्योतिष विधा के अनुसार जब मिथुन राशि में चन्द्रमा, शनि, अथवा बृहस्पति होता है या कुम्भ राशि में मंगल और केतु पीड़ित होता है तो तपेदिक रोग की संभावना बनती है। इस रोग से पीड़ित होने पर पुखराज, मोती अथवा मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है।

पैरों में रोग और रत्न चिकित्सा (Leg problem and Gemstone  Therapy)

शरीर के अंगों में पैरों का स्वामी शनि होता है। पैरों से सम्बन्धित पीड़ा का कारण शनि का पीड़ित या पाप प्रभाव में होना है। ज्योतिषीय मतानुसार जन्मपत्री के छठे भाव में सूर्य अथवा शनि होने पर पैरों में कष्ट का सामना करना होता है। जल राशि मकर, कुम्भ अथवा मीन में जब राहु, केतु, सूर्य या शनि होता है तब पैरों में चर्म रोग होने की संभावना बनती है। पैरों से सम्बन्धित रोग में लाजवर्त, नीलम अथवा नीली एवं पुखराज धारण करने से लाभ मिलता है।

त्वचा रोग और रत्न चिकित्सा (Skin Disease Gemstone Theraphy)

शुक्र त्वचा का स्वामी ग्रह है। बृहस्पति अथवा मंगल से पीड़ित होने पर शुक्र त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे दाद, खाज, खुजली, एक्जीमा देता है। कुण्डली में सूर्य और मंगल का योग होने पर भी त्वचा सम्बन्धी रोग की सम्भावना रहती है। मंगल मंदा होने पर भी इस रोग की पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है। जन्मपत्री में इस प्रकार की स्थिति होने पर हीरा, स्फटिक, मूंगा अथवा ओपल धारण करने से लाभ मिलता है।


बवासीर और रत्न चिकित्सा (Piles and Gemstone Therapy)

बवासीर गुदा का रोग है। जन्मकुण्डली का सप्तम भाव गुदा का कारक होता है। जिनकी जन्मपत्री के सप्तम भाव में पाप ग्रहों की उपस्थिति होती है उन्हें इस रोग की संभावना रहती है, मंगल की दृष्टि इस संभावना को और भी प्रबल बना देती है। मंगल की राशि वृश्चिक कुण्डली में पाप प्रभाव में होने से भी बवासीर होने की संभवना को बल मिलता है। अष्टम भाव में शनि व राहु हो अथवा द्वादश भाव में चन्द्र और सूर्य का योग हो तो इस रोग की पीड़ा का सामना करना होता है। इस रोग में मोती, मूनस्टोन अथवा मूंगा धारण करना रत्न चिकित्सा की दृष्टि से लाभप्रद होता है।

नोट रत्न धारण करने से पहले किसी विशेषज्ञ की सलाह लेना चाहिए।  
 

राशि रत्न खरीदें परखकर (Check Gemstone before Purchase)

रत्नों का गोरखधंधा
मनुष्य की सहज प्रकृति है कि वह हमेशा सुख में जीना चाहता है परंतु विधि के विधान के अनुसार धरती पर ईश्वर भी जन्म लेकर आता हे तो ग्रहों की चाल के अनुसार उसे भी सुख दु:ख सहना पड़ता है.हम अपने जीवन में आने वाले दु:खों को कम करने अथवा उनसे बचने हेतु उपाय चाहते हैं.उपाय के तौर पर अपनी कुण्डली की जांच करवाते हैं और ज्योतिषशात्री की सलाह से पूजा करवाते हैं, ग्रह शांति करवाते हैं अथवा रत्न धारण करते हैं.रत्न पहनने के बाद कई बार परेशानियां भी जाती हैं अथवा कोई लाभ नहीं मिल पाता है.इस स्थिति में ज्योतिषशास्त्री के ऊपर विश्वास डोलने लगता है.जबकि हो सकता है कि आपका रत्न सही नहीं हो.वास्तव में रत्न खरीदते समय काफी समझदारी से काम लेना चाहिए क्योंकि असली और नकली रत्नों में काफी समानता रहती है जिससे गोरख धंधा के आप शिकार हो सकते हैं.

रत्नों की खरीद
रत्न अपरिचित स्थान से नहीं खरीदना चाहिए.रत्न खरीदते समय ध्यान रखना चाहिए कि व्यक्ति विश्वसनीय एवं रत्नों का जानकर हो.रत्न खरीदने से पहले बाज़ार भाव का पता कर लेना इससे रत्न की सत्यता और मूल्य का वास्तविक अनुमान भी मिल जाता है.रत्न अगर टूटा हुआ हो अथवा उसमें दाग़ धब्बा हो तो कभी नहीं खरीदना चाहिए.इन रत्नों का प्रभाव कम होता है और कुछ स्थितियों में प्रतिकूल परिणाम भी देता है.

रत्नों के रंग
रत्नों को खरीदते समय उनके रंगों पर भी ध्यान देना चाहिए.सम्पूर्ण रत्न का रंग एक होना चाहिए.फीका और मंद रंग वाले रत्न की अपेक्षा झलकदार और आभायुक्त रत्न अधिक गुणवत्ता वाले और मूल्यवान होंते हैं.इसका तात्पर्य यह नही है कि रत्न का रंग बहुत अधिक गहरा होना चाहिए.अत्यधिक गहरा रंग भी रत्नों की गुणवत्ता को कम करते हैं.रंगों से भी असली और नकली रत्नों की पहचान होती है जिसकी जांच स्पेक्ट्रोमस्कोप द्वारा की जाती है.

रत्न में पारदर्शिता
पारदर्शिता रत्नों की खास विशेषता है.जो रत्न जितना पारदर्शी होता है उतना ही उच्च स्तर का माना जाता है और उसी के अनुरूप उसकी कीमत भी होती है.अपवाद के रूप में मूंगा ऐसा रत्न है जो अपारदर्शी होते हुए भी मूल्यवान होता है.रत्नों की पारदर्शिता में अंतर प्राप्ति स्थान के आधार पर होता है.अलग अलग स्थान से प्राप्त रत्नों में झीरम की मात्रा में अंतर के आधार पर पारदर्शिता में विभेद होता है.

रत्न चिकित्सा और ग्रहों से सम्बन्धित रोग (Gem Therapy and Diseases Related to Planets)

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प्राचीन काल से रोगों के उपचार हेतु रत्नों का प्रयोग विभिन्न रूपों में किया जाता रहा है.रत्नों में चुम्बकीय शक्ति होती है जिससे वह ग्रहों की रश्मियों एवं उर्जा को अवशोषित कर लेती है (Gems have therapeutic value due to their innate power).
जिस ग्रह विशेष का रत्न धारण करते हैं उस ग्रह की पीड़ा से बचाव होता है और सकारात्मक प्रभाव प्राप्त होता है.रत्न चिकित्सा का यही आधार है.

बृहस्पति से सम्बन्धित रोग और रत्न (Diseases related to Jupiter and Gems for their therapy)
ग्रहों में बृहस्पति को गुरू का स्थान प्राप्त है.इस ग्रह के अधीन विषय हैं गला, पेट, वसा, श्वसनतंत्र.कुण्डली में जब यह ग्रह कमजोर होता है तो व्यक्ति कई प्रकार के रोग का सामना करना होता हे.व्यक्ति सर्दी, खांसी, कफ से पीड़ित होता है.गले का रोग परेशान करता है, वाणी सम्बन्ध दोष होता है.पीलिया, गठिया, पेट की खराबी व कीडनी सम्बन्धी रोग बृहस्पति के कारण उत्पन्न होता है.रत्नशास्त्र में पुखराज (Pukhraj – Yellow Saphire – is the remedy for Jupiter) को बृहस्पति का रत्न माना गया है.इस रत्न के धारण करने से शरीर में बृहस्पति की उर्जा का संचार होता है जिससे इन रोगों की संभावना कम होती है एवं रोग ग्रस्त होने पर जल्दी लाभ मिलता है.

शुक्र से सम्बन्धित रोग और रत्न (Diseases related to Venus and Gemstone Remedy)
शुक्र ग्रह सौन्दय का प्रतीक होता है.यह त्वचा, मुख, शुक्र एवं गुप्तांगों का अधिपति होता है.कुण्डली में शुक्र दूषित अथवा पाप पीड़ित होने पर व्यक्ति को जिन रोगों का सामना करना होता है उनमें गुप्तांग के रोग प्रमुख हैं.इस ग्रह के कारण होने वाले अन्य रोग हैं तपेदिक, आंखों के रोग, हिस्टिरिया, मूत्र सम्बन्धी रोग, धातु क्षय, हार्निया.इस ग्रह का रत्न मोती (Pearl is the remedy gemstone for Venus) है जो अंतरिक्ष में मौजूद इस ग्रह की रश्मियों को ग्रहण करके इसे  व्यक्ति को स्वास्थ्य लाल मिलता है.  ज्योतिष के अनुसार आपके लिये कौन सा ग्रह अनुकूल है इसके लिये आप एस्ट्रोबिक्स पर जाकर यहां क्लिक करके अपनी जन्मतिथि, जन्मस्थान एवं जन्म समय भरकर ज्ञात कर सकते हैं
 

शनि से सम्बन्धित रोग और रत्न (Diseases and gemstones related to Saturn)
ज्योतिषशास्त्र में शनि को क्रूर ग्रह कहा गया है.इस ग्रह का प्रिय रंग काला और नीला है.इस ग्रह का रत्न नीलम (Blue Sapphire is the remedy for Saturn) है.जिससे नीली आभा प्रस्फुटित होती रहती है.इस रत्न को बहुत ही चमत्कारी माना जाता है.इस रत्न को धारण करने से शनि से सम्बन्धित रोग जैसे गठिया, कैंसर, जलोदर, सूजन, उदरशूल, कब्ज, पक्षाघात, मिर्गी से बचाव होता है.जो लोग इन रोगों से पीड़ित हैं उन्हें इस रत्न के धारण करने से लाभ मिलता है.शनि के कारण से दुर्घटना और हड्डियों में भी परेशानी आती है.नीलम धारण करने से इस प्रकार की परेशानी से बचाव होता है.

राहु से सम्बन्धित रोग और रत्न (Diseases related to Rahu and Gem Therapy)
ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से राहु शनि के समान ही पापी ग्रह है.कुण्डली में अगर यह ग्रह अशुभ स्थिति में हो तो जीवन में प्रगति को बाधित करने के अलावा कई प्रकार के रोगों से परेशान करता है.इस ग्रह का रत्न गोमेद है जिसे धारण करने से राहु से सम्बन्धित रोग से बचाव एवं मुक्ति मिलती है.राहु के कारण से अक्सर पेट खराब रहता है.मस्तिष्क रोग, हृदय रोग, कुष्ठ रोग उत्पन्न होता है.राहु बाधा से कैंसर, गठिया, चेचक एवं प्रेत बाधा का भी सामना करना होता है.गोमेद चांदी अंगूठी (Gomedh – Cat’s Eye is the remedy for Rahu) में पहनना इन रोगों एवं परेशानियों में लाभप्रद होता है.
 

केतु से सम्बन्धित रोग और रत्न (Diseases for Ketu and Gem Remedy)
केतु और राहु एक ही शरीर के दो भाग हैं अत: इसकी प्रकृति भी राहु के सामन है.इसे भी क्रूर ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है.कुण्डली में केतु पाप प्रभाव में होने पर इसका रत्न लहसुनियां धारण करना चाहिए.लहसुनियां धारण करने से केतु के अशुभ प्रभाव के कारण होने वाले रोगों से मुक्ति एवं राहत मिलती है.अगर शरीर में रक्त की कमी हो, मूत्र रोग, त्वचा सम्बन्धी रोग, हैजा, बवासीर, अजीर्ण तो यह समझ सकते हैं कि केतु का अशुभ प्रभाव आपके ऊपर हो रहा है.अगर आप इस अशुभ प्रभाव से बचना चाहते हैं तो आपको सूत्र मणि अर्थात लहसनियां पहनना चाहिए.लहसुनियां  (Lahsuniya is the gemstone for Ketu) पहनने से प्रसव काल में माता को अधिक कष्ट नहीं सहना पड़ता है 

अंक ज्योतिष (Numerology)

संसार में ज्योतिष की कई शाखाऎं (Branches Of Astrology) हैं, जिनमें से अंक ज्योतिष भी एक है. सामान्यतय ज्योतिष में ग्रहो का प्रभाव कार्य करता है. प्रत्येक ग्रह किसी न किसी नम्बर से जुडा हुआ है या हुम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि कोइ एक नम्बर किसी ग्रह विशेष का प्रतिनिधित्व करता है,
जैसे कि 1 नम्बर सूर्य (1 Number of Sun), 2 नम्बर चन्द्र (2 Number of Moon) तथा 9 नम्बर मंगल (9 Number Of Mars) या इत्यादि. नम्बर 1 से 9 तक ही लिए जाते हैं. 0 को इसमें सम्मिलित नही किया गया है. ग्रह भी 9 ही होते हैं, अतः प्रत्येक ग्रह का एक विशेष अंक है. पाश्चात्य अंक ज्योतिष (Numerology) सात ग्रहो के अलावा नैपच्यून व यूरेनस को क्रमशः आठवाँ व नौवा ग्रह मानता है. जबकि  भारतीय अंक ज्योतिष राहु-केतु को आठवें एंव नवें ग्रह के रुप में लेता है. भारतीय एंव पाश्चात्य अंक ज्योतिष के फलादेश (Jyotish Phaladesh) कथन में थोडा सा अन्तर रहता है.imageअब हम अंक ज्योतिष विज्ञान के कार्य करने के तरीके (Method Of Numerology) की विवेचना करेंगे. वैसे तो अंक ज्योतिष में बहुत सारी परिभाषाएँ सामने आती हैं, परन्तु हम इसमें मुख्य रुप से दो परिभाषाओ मूलांक (Root Number/ Ruling Number) तथा भाग्यांक (Fadic Number) की ही चर्चा करेंगे. किसी भी व्यक्ति की जन्म तारीख उसका मूल्यांक होता है. जैसे कि 2 जुलाई को जन्मे व्यक्ति का मूलांक 2 होता है तथा 14 सितम्बर वाले का 1+4 = 5. तथा किसी भी व्यक्ति की सम्पूर्ण जन्म तारीख के योग को घटा कर एक अंक की संख्या को उस व्यक्ति विशेष का भाग्यांक( Bhagya Anka) कहते हैं, जैसे कि 2 जुलाई 1966 को जन्मे व्यक्ति का भाग्यांक 2+07+1+9+6+6= 31 = 3+1= 4, होगा. मूलांक तथा भाग्यांक स्थिर होते हैं, इनमें परिवर्तन सम्भव नही. क्योंकि किसी भी तरीके से व्यक्ति की जन्म तारीख बदली नही जा सकती.

व्यक्ति का एक और अंक होता है जिसे सौभाग्य अंक (Destiny Number/ Lucky Number) कहते हैं. यह नम्बर परिवर्तनशील है. व्यक्ति के नाम के अक्षरो के कुल योग से बनने वाले अंक को सौभाग्य अंक कहा जाता है, जैसे कि मान लो किसी व्यक्ति का नाम RAMAN है, तो उसका सौभाग्य अंक R=2, A=1, M=4, A=1, एंव N=5 = 2+1+4+1+5 =13 =1+3 =4 होगा. यदि किसी व्यक्ति का सौभाग्य अंक उसके अनुकूल नही है तो उसके नाम के अंको में घटा जोड करके सौभाग्य अंक (Saubhagya Anka) को परिवर्तित कर सकते हैं, जिससे कि वह उस व्यक्ति के अनुकूल हो सके. सौभाग्य अंक का सीधा सम्बन्ध मूलांक से होता है. व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव मूलांक का होता है. चूंकि मूलांक स्थिर अंक होता है तो वह व्यक्ति के वास्तविक स्वभाव को दर्शाता है तथा मूलांक का तालमेल ही सौभाग्य अंक से बनाया जाता है.
व्यक्ति के जीवन में उतार-चढाव का कारण सौभाग्य अंक होता है. उदाहरण के लिए मान लो कि हम किसी शहर में जाकर नौकरी/ व्यवसाय करना चाहते हैं, तो हमें उस शहर का शुभांक (Shubha Anka) मालूम करना होगा फिर उस शुभांक को स्वंय के सौभाग्य अंक से तुलना करेंगे. यदि दोनो अंको में बेहतर ताल-मेल है अर्थात दोनो अंक आपस में मित्र ग्रुप के है तो वह शहर आपके अनुकूल होगा, और यदि दोनो अंक एक दूसरे से शत्रुवत व्यवहार रखते हैं तो उस शहर में आपके कार्य की हानि होगी. अब हमारे सामने दो विकल्प हैं, एक तो हम उस शहर विशेष को ही त्याग दें तथा अन्य किसी शहर में चले जायें, यदि एसा करना सम्भव न हो तो दूसरे विकल्प के रुप में हम अपने नाम के अक्षरो में इस प्रकार परिवर्तन करें कि वो उस शहर विशेष से भली भांति तालमेल बैठा लें. यही सबसे सरल तरीका है.
इस प्रकार हम अंक ज्योतिष के माध्यम से अपने जीवन को सुखी एंव समृद्ध बना सकते है एंव दुख व कष्टो को कम कर सकते हैं.