Sunday, 17 February 2013

विवाह से पूर्व प्रश्न कुण्डली से जानिए भावी दम्पत्ति का स्वभाव (Know the nature of the married couple through Horary astrology)

image
विवाह के बाद पति पत्नी में उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर बात बहुत आगे बढ़ जाती है. प्रश्न कुण्डली से लड़का लड़की का स्वभाव अगर विवाह से पहले ही देख लिया जाए तो विवाह के बाद आने वाली कई परेशानियों से बचाव हो सकता है.
विवाह के लिए लड़का लड़की की कुण्डली में ग्रह स्थिति (Placement of planets in the kundalis)
विवाह के लिए कुण्डली में गुरू और शुक्र को कारण ग्रह के रूप में देखा जाता है. प्रश्न कुण्डली में इस विषय के लिए पुरूष की कुण्डली में शुक्र और चन्द्र को देखा जाता है और स्त्री की कुण्डली में सूर्य और मंगल को देखा जाता है. अगर इनकी स्थिति शुभ कुण्डली में शुभ नहीं है तो वैवाहिक जीवन में कठिनाई का संकेत प्राप्त होता है. व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र को लग्न से देखा जाता है (Ascendant is analysed to predict the person's nature) एवं वैवाहिक जीवन की स्थितियों को सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव से देखा जाता है. अगर कुण्डली में सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव अशुभ प्रभाव में हो और लग्न में पाप ग्रह हो अथवा सप्तम में पाप ग्रह स्थित हो कर लग्न को देख रहा हो तब व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव वैवाहिक जीवन में परेशानियों का कारण होता है. विवाह के संदर्भ में मंगल भी काफी महत्वपूर्ण होता है. इसकी दृष्टि और उपस्थिति भी कई बार वैवाहिक सुख में व्यवधान का कारण होता है.

प्रश्न कुण्डली में लड़का लड़की का का स्वभाव और चरित्र (The character and nature of the persons through Prashna Kundali)
प्रश्न कुण्डली में कुछ ऐसे ग्रह स्थितियों का वर्णन किया गया है जिन्हें देखकर इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि व्यक्ति का स्वभाव और चरित्र कैसा है. प्रश्न कुण्डली के अनुसार जब लड़का लड़की के चरित्र के विषय में जानने के लिए प्रश्न पूछा जाता है तब कुण्डली में अगर मंगल और शुक्र की युति बनती है अथवा शुक्र और मंगल के बीच दृष्टि सम्बन्ध बनता है तो यह इस बात का संकेत होता है कि अपने चरित्र और व्यवहार के कारण वैवाहिक जीवन में पति पत्नी एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं होंगे. चन्द्रमा सातवें घर में मंगल और राहु के साथ बैठा हो (when moon is in the seventh house with mars and rahu) और सप्तमेश एवं शुक्र पर मंगल अथवा शनि की अशुभ दृष्टि हो तो पति पत्नी में नैतिकता का अभाव होता है. द्वितीय, छठे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी कुण्डली में कहीं भी युति बनाते है तो चंचल स्वभाव का संकेत मिलता है. पति पत्नी में समर्पण भाव का अभाव उस स्थिति में भी होता है जब बुध और शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होती है और चतुर्थ भाव को शनि देख रहा होता हो.



पति पत्नी के चरित्र के विषय में प्रश्न कुण्डली का उदाहरण (Example of marriage from the prashna kundali)
मनोज की शादी की बात काफी हद तक आगे बढ़ चुकी थी. लेकिन मनोज के माता पिता के मन में यह बात घूम रही थी कि पता नहीं लड़की कैसी और उसका स्वभाव कैसा है. अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए इन्होंने प्रश्न कुण्डली से इस विषय का उत्तर जानना चाहा. 23 मई 2009 को 5 बजकर 12 मिनट पर इन्होंने अपना प्रश्न किया किया. लग्न निर्धारण के लिए इन्होंने कृष्णमूर्ति पद्धति से 1 से 249 तक दिये गये अंक में अंक 19 को चुना और वैदिक पद्धति के अनुसार 1 से 108 मे अंक 7 को चुना. इस प्रकार इनकी प्रश्न कुण्डली तैयार हुई. कुण्डली में लग्न आया तुला जिसका स्वामी है शुक्र. राशि है मेष जिसका स्वामी है मंगल.  नक्षत्र है भरणी जिसका स्वामी है शुक्र. इनकी प्रश्न कुण्डली में छठे भाव में मंगल और शुक्र की युति बन रही है. लग्न भाव में शनि की दृष्टि है. तुला लग्न की कुण्डली होने से शनि अपनी अशुभता नहीं देगा लेकिन छठे भाव में शुक्र मंगल की युति के कारण पति पत्नी दोनों ही स्वतंत्र विचार के होंगे

कालांश और विंशोत्तरी दशा में सम्बन्ध (Relationship between Kalansha and Vimshottari Dasha)

image
आधुनिक ज्योतिष परम्परा में कृष्णमू्र्ति महोदय ने एक नयी विधा को जन्म दिया है। यह विधा वैदिक ज्योतिष के मूलभूत सिद्धांतों का अनुपालन करता है लेकिन फिर भी यह कुछ बातों में वैदिक ज्योतिष से अलग मत रखता है।
सामान्यतौर पर बात करें तो जहां मूल वैदिक ज्योतिष राशियों को आधार मानकर फलादेश करता है वहीं कृष्णमूर्ति महोदय की ज्योतिष पद्धति नक्षत्रों को महिमा मंडित करता है (Vedic Jyotish depends on Moon sign and the Krishnamurthy system is based on the Nakshatra)।
कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्रों के विभाजन में जिस सिद्धांत को अपनाया गया है वह वैदिक ज्योतिष के विंशोत्तरी दशा पर आधारित है (In Krishnamoorthy system, divison of Nakshatra is done on the basis of Vimshottari Dasha)। इस आधार पर देखा जाय तो कृष्णमूर्ति महोदय के कालांश और वैदिक ज्योतिष के विंशोत्तरी दशा के बीच निकट सम्बन्ध है। के.पी. महोदय की प्रणाली में नक्षत्रों की अवधि 13डिग्री 20 मिनट को 9 सूक्ष्म भागों में वांटा है।  इन सभी भागों का स्वामी अलग अलग ग्रह होता है। विंशोत्तरी दशा में जिस ग्रह का कालावधि जितना होता है उसी अनुपात में ग्रहों का समय निश्चित किया गया है। समय का यह अंश कालांश कहा गया है और इसके स्वमी को कालांश स्वामी के नाम से सम्बोधित किया गया है।

विंशोत्तरी दशा में व्यक्ति की मानक आयु 120 वर्ष है (According to Vimshottari Dasha average Human life span is 120 years) । इन वर्षों में व्यक्ति को विभिन्न ग्रहों की दशाओं से गुजरना होता है। हर ग्रह की एक निश्चित अवधि होती है और उस अवधि में उस ग्रह के प्रभाव के अनुरूप व्यक्ति को फलाफल मिलता है। के. पी. पद्धति में भी इसी प्रकार के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है।  इसमें फलित के निकट पहुंचने के लिए एक गणितिय विधि का प्रयोग किया गया है जिसमें विंशोत्तरी दशा की कुल अवधि यानी 120 से नक्षत्रों की कुल अवधि यानी 13 डिग्री 20 को घंटे में ज्ञात कर यानी 800 में विंशोत्तरी दशा में मौजूद ग्रहों की दशा के वर्ष से गुणा किया जाता है। इस गणितिय विधि से जो अंक प्राप्त होता है वह कालांश क्षेत्र या ग्रहों का उपक्षेत्र कहलाता है। 
उपरोक्त तथ्यों को आप इस प्रकार समझ सकते हैं।       
                                   800
ग्रहों की दशा का वर्ष  x  ---------    =  ग्रहों का उपक्षेत्र या कालांश क्षेत्र
                                  120
इस प्रकार कृष्णमूर्ति पद्धति में विभिन्न ग्रहों की दशा, विंशोत्तरी दशा के आधार पर निर्धारित की गई है और दोनों में काफी कुछ समानता है। कृष्णमूर्ति पद्धति में ग्रहों के कालांश क्षेत्र में कमी होने से प्राचीन वैदिक ज्योतिष प्रणाली की तरह इस नवीन पद्धति से भी फलादेश सटीक ज्ञात किया जा सकता है। 
नोट:  आप कम्पयूटर द्वारा स्वयं जन्मकुण्डली, विवाह मिलान और वर्षफल का निर्माण कर सकते हैं. यह सुविधा होरोस्कोप एक्सप्लोरर में उपलब्ध है. आप इसका 45 दिनों तक मुफ्त उपयोग कर सकते हैं. कीमत 1250 रु. जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करे

कृष्णमूर्ति पद्धति का आधार है वैदिक ज्योतिष (Krishnamoorthy system is based on Vedic Jyotish)

image
भारतीय ज्योतिष विधा में वैदिक ज्योतिष सबसे प्राचीन और प्रमाणिक माना जाता है (Vedic Astrology is the father of all new Astrology System)। कृष्णमूर्ति पद्धति भी वैदिक ज्योतिष पर आधारित है कैसे और कहां तक यहां इन्हीं बातों का जिक्र किया जा रहा है।
वैदिक ज्योतिष को आधार मानकर आज भी ज्योतिषशास्त्री इसके विभिन्न विषयों को लेकर प्रयोग करते रहते हैं। ज्योतिष की कृष्णमूर्ति पद्धति जिसका प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में हुआ है, यह भी वैदिक ज्योतिष पर ही आधारित है। कृष्णमूर्ति पद्धति को लेकर वैदिक ज्योतिष में आस्था रखने वाले ज्योतिषशास्त्रियों में यह भ्रम बना हुआ है कि यह प्रमाणिक नहीं है क्योंकि यह वैदिक ज्योतिष पर आधारित नहीं है। वैसे ज्योतिषशास्त्री जो इस तरह की विचारधारा रखते हैं उन्हें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कृष्णमूर्ति भी वैदिक ज्योतिष के मानने वालों में से हैं। उन्हेंने फलादेश को वास्तविकता के निकट लाने हेतु इसमें प्रयोग किया है। यह प्रयोग क्या है और यह किस प्रकार वैदिक ज्योतिष से सम्बन्ध रखता है यहां इसी विषय पर हम विचार कर रहे हैं।
वैदिक ज्योतिष में राशि को प्रमुखता दी गई है और फलादेश के लिए राशियों का विभाजन 30 डिग्री पर किया गया है। इसके अलावा वैदिक ज्योतिष पद्धति में भचक्र (राशिचक्र) को 27 भागों में विभक्त किया गया है और नक्षत्रों का निर्माण किया गया है। श्री कृष्णमूर्ती ने नक्षत्रों पर शोध किया, और पाया कि इनके ज़रिये सटीक फलादेश किया जा सकता है।

उन्होंने नक्षत्रों के विंशोत्तरी दशा से संबंध की खोज की, और अपनी पद्धति में उसका समावेश किया (Krishnamurthi relates Nakshatra to Vimsottari Dasha)। विंशोत्तरी दशा में व्यक्ति के जीवनकाल को 120 वर्षों का माना गया है। इसमें यह माना गया है कि इस दौरान व्यक्ति पर भिन्न ग्रहों का प्रभाव रहता है, जिसके अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। मान लीजिए आपका जन्म सूर्य की विंशोत्तरी दशा में हुआ है जिसकी अवधि 6 वर्ष की होती है तो आपको सूर्य के बाद आने वाले ग्रहो की दशा से गुजरना होता है जैसे चन्द्र, मंगल से लेकर शुक्र तक। विंशोत्तरी दशा चक्र (Vimsottari Dasha Chakra) को समझने के लिए आप दिये गये चार्ट को देखकर विषय को और भी अच्छी तरह समझ सकते हैं।
कृष्णमूर्ति महोदय अपनी पद्धति में फलादेश की निकटता तक पहुंचने के लिए वैदिक ज्योतिष के सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म की ओर जाने की बात करते हैं (Krishnamurthy system attempts to access the microcosm)। यही कारण है कि इन्होंने राशि के बदले नक्षत्रों को प्रमुखता दिया है।
वैदिक ज्योतिष की पुरानी पद्धति में हम सूक्ष्म फल कथन के लिये नवांश का इस्तेमाल करते हैं, जो की राशि का नौंवा हिस्सा है (Navamsa is ninth part of zodiac sign)। इन्होंने राशि के बदले नक्षत्रों को 9 भागों में विभाजित किया है अर्थात 13 डिग्री 20 मिनट को नौ भागों में बांटा गया है (Krshnamoorthy divides  Nakshatra in nine part but this division is not equal)। लेकिन यह विभाजन भी समान नहीं है इसमें विंशोंत्तरी दशा में ग्रहों की अवधि के आधार पर विभाजन किया गया है जिससे कालांश का जन्म हुआ है। यानी वैदिक ज्योतिष से थोड़ा हटकर इन्हें नवमांश के बदले कालांश को अपनाया है।
कालांश के कारण इस विधि से अगर फलादेश किया जाता है तो सूक्ष्म घटनाओं का भी कथन हो सकता है। इस पद्धति में वैदिक ज्योतिष के अन्य तमाम विषयों एवं सिद्धांतों को वास्तविक रूप में स्वीकार किया गया है। वैदिक ज्योतिष में आस्था रखने वाले ज्योतिषशास्त्री अगर इस पद्धति से वैदिक ज्योतिष के फलादेश को निकालने की कोशिश करें तो उन्हें निश्चित ही सुपरिणाम प्राप्त होंगे।
निष्कर्ष के तौर पर यही कह सकते हैं कि वैदिक ज्योतिष देव स्वरूप है जिसके निकट पहुंचने के लिए आप राशि पद्धति नवमांश को अपनाएं या कृष्णमूर्ति के नक्षत्र पद्धति यानी कालांश को, मकशद जातक के जीवन के सम्बन्ध में फलादेश के निकट पहुंचना है।
नोट:  आप कम्पयूटर द्वारा स्वयं जन्मकुण्डली, विवाह मिलान और वर्षफल का निर्माण कर सकते हैं. यह सुविधा होरोस्कोप एक्सप्लोरर में उपलब्ध है. आप इसका 45 दिनों तक मुफ्त उपयोग कर सकते हैं. कीमत 1250 रु. जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करे

नवमांश और कालांश में विभेद (Difference between Navamansha & Kalamsha)

image
प्राचीन काल के ऋषियों के विषय में कहा जाता है कि वे त्रि-कालदर्शी होते थे। त्रि -कालदर्शी अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों पर उनकी दृष्टि रहती थी। आज वक्त बदल गया है और हमारी जीवनशैली में भी काफी बदलाव आ गया है। अब न तो हमारे पास धैर्य है और न तो इतनी साधना करने का साहस है।
आज भूत, भविष्य तो क्या वर्तमान को समझना भी हम लोगों के लिए कठिन हो गया है। इस स्थिति में परम पिता ब्रह्मा द्वारा प्रदान किया गया वेद और उसमें वर्णित ज्योतिष हमारे लिए बहुत ही लाभप्रद और उपयोगी है। वैदिक ज्योतिष की इस महान विधा से व्यक्ति के जीवन की सभी घटनाओ की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
वैदिक ज्योतिष अपने आप में रहस्य का भंडार है (Vedic Astrology is a mystery)। वैदिक ज्योतिष की गूढ़ता को कम करने और नई पीढियों के लिए इसे और भी आसान बनाने व सटीक फलादेश के लिए हर युग में महान ज्योतिषशास्त्रियों ने शोध किये जिससे कई नये तथ्य उभरकर सामने आये। 20वीं सदी के महान दक्षिण भारतीय ज्योतिषशास्त्री कृष्णमूर्ति महोदय ने एक ऐसी पद्धति को जन्म दिया जो कृष्णमूर्ति पद्धति के नाम से जानी जाती है (Legendary South Indian Astrologer Krishnamoorthy developed an Astrological system that is called Krishnamoorthy System)। इस पद्धति में सटीक फलादेश तक पहुंचने के लिए नवमांश की जगह कालांश से गणना की जाती है (In Krishnamoorthy system Kalamsa replaces Navmansha)।

नवमांश और कालांश दोनो का आधार वैदिक ज्योतिष है परंतु फिर भी इनके मध्य कई अंतर हैं (Navmasha and kalmasha theories are established on Vedic Jyotish but there are some differences between them.)। कालांश किस प्रकार नवमांश से अलग है इसे समझने के लिए आप कुछ तथ्यों पर दृष्टि डाल सकते हैं। सबसे पहली बात तो यह की नवमांश राशियों का विभाजन है, और कालांश नक्षत्रों का (Navmasha is the division of Sign while Kalmasha is of Nakshatra)।
ज्योतिष के प्राचीन वैदिक रूप में हम सूक्ष्म घटनाओं की जानकारी के लिये नवमांश का ही उपयोग करते आये हैं। लेकिन श्री कृष्णमूर्ति ने राशि के बजाय नक्षत्रों के भाग करने की नयी पद्धति विकसित की, जिसके द्वारा और भी सूक्ष्म घटनायें ज्ञात हो सकती हैं। नवमांश में राशि को, और कालांश में नक्षत्र को नौ भागों में बांटा जाता है।
आइये अब इस फर्क को पूर्ण रूप से समझें। नवमांश में एक राशि की अवधि  - 30 डिग्री को 9 बराबर भागों में बाँटा गया है। जिससे हर नवमांश 3 डिग्री 20 मिनट का होता है। नवमांश के सिद्धान्तो से हटकर कालांश नक्षत्रों के 13 डिग्री 20 मिनटों को 9 भागों में बांटता है। लेकिन यह भाग बराबर नहीं है। हर कालांश का स्वामी एक ग्रह बनाया गया है, और उस ग्रह की अवधि विंशोत्तरी दशा के अनुरूप ली गयी है। चुंकि विंशोत्तरी दशा में विभिन्न ग्रहों की अवधि अलग अलग होती है (Period of planet is different in Vimshottari Dasha)। इसलिए कालांश भी एक समान नहीं होते, अर्थात हर कालांश का मान अलग अलग होता है। 
सबसे छोटा कालांश 4 मिनट का, व सबसे बड़ा 2 डिग्री 13 मिनट 20 सेकेन्ड का होता है। कालांश मापक में बहुत छोटा भी हो सकता है जिसके कारण इससे फलादेश वास्तविकता के निकट होता है।
नवमांश और कालांश में संख्याओं का भी अंतर होता है। नवमांश कुल 108 होते हैं जबकि कालांश की कुल संख्या 249 होती है (Navmansh are 108 in number while Kalansha are 249 in number)। आप सोच रहे होंगे कि राशियों की कुल संख्या 12 होती है और 9 से विभाजित होने पर इनकी संख्या 108 होती है फिर नक्षत्र 27 हैं और 9 से विभाजन करने पर 243 कालांश होते हैं तो 6 अतिरिक्त कालांश कैसे आ गये। इस प्रश्न का जवाब यह है कि इस पद्धति में कुछ नक्षत्रों के चरण यानी पद अलग अलग राशियों में होते है जैसे मान लीजिए हम चन्द्र का कालांश लेते हैं इसके नक्षत्र के चरण एक राशि में नहीं होते बल्कि कई राशियों से गुजरते हैं जैसे मिथुन, तुला, कुम्भ इसी प्रकार कर्क, वृश्चिक और मीन राशि से। इस प्रकार विभिन्न राशियों में चरण होने से कालांश में 6 जुट जाते हैं।
कृष्णमूर्ति पद्धति में हर कालांश का स्वामित्व ग्रह को दिया गया है, और यह समझा जाता है कि उस कालांश का फल उस ग्रह के अनुसार होग।

नोट:  आप कम्पयूटर द्वारा स्वयं जन्मकुण्डली, विवाह मिलान और वर्षफल का निर्माण कर सकते हैं. यह सुविधा होरोस्कोप एक्सप्लोरर में उपलब्ध है. आप इसका 45 दिनों तक मुफ्त उपयोग कर सकते हैं. कीमत 1250 रु. जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करे

नवग्रह रत्न माणिक्य और मूंगा (Gemstone Ruby and Coral)

image
रत्न खूबसूरत पत्थर होते हैं जिनमें काफी घनत्व होता है.ये विभिन्न रंगों में पाये जाते हैं.अपने गुणों एवं चमत्कारी प्रभाव के कारण ये रत्न कहलाते हैं.नवग्रहों से सम्बन्धित होने के कारण इन्हें नवरत्न कहा जाता है.इनकी संख्या काफी है परंतु भारतीय ज्योतिष में 84 रत्नो को ही मान्यता प्राप्त है.
माणिक्य की विशेषता (Speciality of Rubies)
माणिक्य का लाल रंग की आभा लिये होता है.यह अन्य रंगों जैसे गुलाबी, काला और नीले रंग में भी पाया जाता है.यह अत्यंत कड़ा होता है.पृथ्वी पर पाये जाने वाले खनिजों में सिर्फ हीरा ही इससे कठोर होता है.जो माणिक्य सूर्य की पहली किरण पड़ने पर लाल रंग बिखेरता है वह सर्वोत्तम होता है.उत्तम माणिक्य की पहचान है कि अगर इसे दूध में 100 बार डुबोते हैं तो दूध मे भी माणिक्य की आभा दिखने लगती है.अंधेरे कमरे में रखने पर यह सूर्य के समान प्रकाशमान होता है.इसे पत्थर पर रगड़े तो इसपर घर्षण के निशान आ जाते हैं लेकिन वजन में कमी नहीं आती है.
माणिक्य धारण करने से लाभ (Benefit of wearing Ruby)
माणिक्य को प्रेम का रत्न भी कहा जाता है क्योकि इसे धारण करने से मन में उत्साह और उमंग बढ़ता है.यह मायूसी और उदासीनता को दूर करता है.ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह प्रेत बाधा से मुक्ति प्रदान करने वाला होता है.इस रत्न को धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है.आर्थिक परेशानी की स्थिति में यह धन प्रदायक होता है.माणिक्य धारण करने वाला व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित होता है.मान्यताओ के अनुसार जो व्यक्ति इसे धारण करता है उसके ऊपर संकट आने पर इसका रंग फीका हो जाता है और संकट टल जाने पर पुन: इसकी आभा लौट आती है.माणिक्य के विषय में यह भी मान्यता है कि यह जहर के प्रभाव को कम करता है एवं जहरीली चीज़ पास होने पर इसक रंग फीका पड़ जाता है.

मूंगा की विशेषता (Characteristics of Coral)मूंगा गुलाबी, काला, सुनहरे रंग का भी पाया जाता है परंतु आमतौर पर जो मूंगा पाया जाता है वह लाल रंग का होता है.लाल मूंगा स्त्रियों के लिए बहुत ही भाग्यशाली माना जाता है.इस रत्न को बहुत ही शुभ कहा गया है.प्राचीन रोमनवासी इसे अलंकार के अलावा तावीज़ के रूप में भी धारण करते थे क्योंकि यह रत्न व्यक्ति में साहस और वीरता का संचार करने वाला होता है.
मूंगा धारण करने से लाभ (Benefits of wearing Coral)मान्यताओं के अनुसार सुहागिन स्त्रियों को मूंगा धारण करने से सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है.जिन लोगों को रात में बुरे बुरे सपने आते हैं और भूत प्रेत का भय होता है उन्हें मूंगा धारण करने से लाभ होता है.जिनकी कुण्डली में मंगल कमजोर अथवा पीड़ित होता है उन्हें मूंगा धारण करने से कई प्रकार की परेशानियों से राहत मिलती है.मूंगा के विषय में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इसे धारण करता है वह अगर रोग से पीड़ित होता है तो इसके रंग में बदलाव आने लगता है, जो व्यक्ति के स्वस्थ होने पर पुन: वास्तविक रंग में लौट आता है.बौद्ध अभिलेखों में मूंगा के विषय में कहा गया है कि यह मानसिक रोग को दूर करने वाला है.यह बौद्धिक क्षमता को बढ़ता है.मूंगा का ताबीज रक्त स्राव को रोकने में कारगर होता है.
ज्योतिष के अनुसार आपके लिये कौन सा रत्न शुभ हैastrobix.com  पर जाकर अपने लिये मुफ्त सलाह लीजिये

नवग्रह रत्न मोती और पन्ना (Gemstone Pearl and Emerald)

image
नवग्रह रत्न सिर्फ सौन्दर्य वर्द्धक ही नहीं होते हैं बल्कि इनमें ज्योतिषीय शक्तियां भी होती है. ये ग्रहों से उनकी उर्जा को अवशोषित करते हैं
नवग्रह रत्न धारण करने वालों को अच्छा और बुरा प्रभाव देते हैं.अत: इसे धारण करने से पहले ज्योतिषशास्त्री अथवा रत्न विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए.
मोती की ज्योतिषीय विशेषता  Astrological Characteristics of Pearl मोती चन्द्रमा का रत्न है.मोती के कई प्रकार हैं.आमतौर पर जो मोती मिलते हैं वह सीप से प्राप्त होता है परंतु शास्त्रों में बताया गया है कि यह हाथी से भी प्राप्त होता जिसे गज मुक्ता कहते हैं.सर्प से मणि के रूप में एवं बांस से बांसलोचन के रूप में प्राप्त होता है.मोती को प्रेम का प्रीतक माना जाता है.यह सौम्य और शांत प्रकृति का होता है.मोती सफेद, चांदी की तरह चमकीला, गुलाबी, नीला, पीला एवं काला भी होता है.सभी प्रकार के मोती की अपनी विशेषता होती है.
मोती धारण करने से ज्योतिषीय लाभ Astrological Benefits of wearing Pearl
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार जिन लोगों को क्रोध जल्दी आता है उन्हें मोती धारण करने से लाभ मिलता है.यह मानसिक शांति प्रदान करने के साथ ही एकाग्रता बढ़ाने में भी कामयाब होता है.संतानहीन व्यक्तियों को मोती धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है.ज्योतिषीय मान्यताओ के अनुसार यह मान प्रतिष्ठा एवं धन व वैभव दायक होता है.मोती रोग शमन करने की भी क्षमता रखता है.बुखार में मोती धारण करना लाभप्रद रहता है.यह हृदय गति को सामान्य बनाए रखता है.आंत्रशोथ, अल्सर एवं पेट सम्बन्धी कई अन्य बीमारियों में भी काफी असरकारी होता है.मोती के संदर्भ में ऐसी मान्यता भी है कि जो व्यक्ति शुद्ध मोती धारण करते हैं उन पर देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है अर्थात व्यक्ति धनवान होता है.पति पत्नी के बीच अगर दूरी बढ़ रही हो तो मोती धारण करने से सम्बन्ध में सुधार होता है.

मोती अलग अलग रंगों में पाया जाता है और इनकी अपनी विशेषता होती है.पीली आभा युक्त मोती धारण करने से धन लाभ होता है.लाल रंग का मोती बौद्धिक क्षमता को बढ़ाता है.सफेद मोती प्रसिद्धि दायक होता है और नीली अभायुक्त मोती ईश्वरीय कृपा प्रदान करने वाला होता है.
पन्ना की ज्योतिषीय विशेषता  Astrological Characteristics of Emerald
पन्ना बुध ग्रह का रत्न है.जिनकी कुण्डली में बुध कमज़ोर होता है उन्हें पन्ना धारण करने से लाभ होता है.पन्ना कई रंगों में पाया जाता है लेकिन सब में हरे रंग की आभा झलकती रहती है जैसे तोते के पंख के समान हरा, मोर पंख के समान हरा, संदुल पुष्प के समान हरा, पारदर्शी हरा.ज्येतिषशास्त्र और रत्नशास्त्र के अनुसार चमकीला, आभायुक्त, जल के समान पारदर्शी और दाग एवं धब्बा रहित पन्ना उत्कृष्ट होता है.आम तौर पर दोष रहित पन्ना अत्यंत दुर्लभ होता है.यह बहुत ही नरम पत्थर होता है अत: कटिंग के समय इसमें दरारें आने की संभावना अधिक रहती है.बाजार में विशेष प्रकार के रासायनों का प्रयोग करके इन दरारों को छुपा दिया जाता और इसकी सुन्दरता को बढ़कर दोष रहित पन्ना के मूल्य में बेचा जाता है अत: खरीदते समय अच्छी तरह परख कर ही पन्ना खरीदना चाहिए.
पन्ना धारण करने से ज्योतिषीय लाभ  Astrological Benefits of wearing Emerald
पन्ना को दयालुता और प्रेम का प्रतीक माना जाता है.प्रेमी के द्वारा उपहार स्वरूप पन्ना प्राप्त करना भाग्य को प्रबल बनाता है.मिथुन राशि वालों के लिए पन्ना बहुत ही शुभ फलदायी होता है.इसे धारण करने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है.धन और खुशी के लिए भी पन्ना धारण करना लाभप्रद होता है.पन्ना सर्पदंश की संभावना को कम करता है.बुरी नज़र और बुरी आत्माओं से रक्षा करता है.गर्भवती महिला अगर पन्ना धारण करती हैं तो प्रसव वेदना से राहत मिलती है.मानसिक अशांति, रक्त संचार में परेशानी, स्नायु विकार में पन्ना फायदेमंद होता है.इसे धारण करने से सहनशीलता और मानसिक स्थिरता का विकास होता है.
ज्योतिष के अनुसार आपके लिये कौन सा रत्न शुभ हैastrobix.com  पर जाकर अपने लिये मुफ्त सलाह लीजिये

नवग्रह रत्न लहसुनियां और लाजवर्त (Gemstone Cat's Eye and Lapis Luzuli)

image
राहु के समान छाया गया केतु होता है. केतु हमेशा वक्री रहता है. मंदा केतु दुर्घटना एवं रोग देता है जिससे शल्य चिकित्सा की भी संभावना बनती है. केतु का रत्न लहसुनियां है जो केतु की उर्जा एवं शक्ति को आकर्षित करके धारण करने वालों को केतु के विपरीत प्रभाव से बचाता है.
लहसुनियां की ज्योतिषीय विशेषता Astrological Characteristics of  Cat's Eye लहसुनियां आमतौर पर पीली और काली रंगत लिये होता है. इस रत्न को घुमाने पर इसके किनारे पर चमकीली आभा दृष्टि गोचर होती है. इस चमकीली आभा के कारण इसे सूत्र मणि भी कहा जाता है. वर्मा के मोगोक खदान से प्राप्त होने वाला लहसुनियां उच्च कोटि का होता है. उच्च कोटि का लहसुनिया पीली आभा लिये होता है जिसपर सफेद रंग की पतली धारी चमकती रहती है. यह धारी जितनी सीधी होती है रत्न उतना ही उत्तम कहलाता है.

लहसुनियां धारण करने से लाभ Astrological Benefits of wearing Cat's Eye
दोष रहित लहसुनियां अति प्रभावशाली होता है जो धारण करने पर तुरंत ही अपना असर दिखाना शुरू करता है. यह रत्न संतान पक्ष की ओर से प्रसन्नता एवं खुशी प्रदान करता है. आर्थिक परेशानियों में भी लहसुनियां काफी लाभप्रद होता है. लहसुनियां खोये हुए धन की प्राप्ति करवाता है और शत्रु पीड़ा से मुक्ति प्रदान करता है. यह मन को अध्यात्म की ओर प्रवृत करता है. लहसुनियां जादू टोना, आत्माओं से सम्बन्धित शक्तियां हासिल करने में सहायक रत्न होता है. यह साहसिक कामों में सफलता दिलाता
लाजवर्त की ज्योतिषीय विशेषता Astrological Characteristics of Lapis Luzuli
लाजवर्त अथवा राजवर्त शनि का रत्न है. इसे लैपिज लूजली के नाम से भी जाना जाता है. प्राचीन काल में यह मंहगे रत्नों में शुमार किया जाता था. लाजवर्त नीले रंग का होता है और इसपर सुनहरी धारियां होती है जिससे यह खूबसूरत दिखता है. आफगानिस्तान में यह रत्न काफी मात्रा में पाया जाता है. यह प्रेम और सद्भावना का प्रीतक माना जाता है.
लाजवर्त धारण करने से लाभ Astrological Benefits of wearing Lapis Luzuli
लाजवर्त शनि की पीड़ा से बचाव करता है साथ ही राहु के विपरीत प्रभाव से भी सुरक्षा प्रदान करता है. जो महिलाएं संगीत, नृत्य से जुड़ी हुई हैं लाजवर्त उनके लिए सफलता प्रदायक होता है. पुरूष जो इस रत्न धारण करते हैं उनमें सकारत्मक उर्जा का संचार होता है. व्यक्ति के मन में निराशात्मक विचार जन्म नहीं लेता हैं.. 
लाजवर्त आंखो के लिए लाभदायक रत्न होता है. इसे धारण करने से नेत्र रोग में फायदा होता है. यह बुखार में भी असरकारी होता है. पेट सम्बन्धी कई प्रकार की बीमारियों में राजवर्त कारगर होता है. मानसिक शांति एवं पारिवारिक खुशियो कें लिए भी लाजवर्त उत्तम रत्न होता है. यह आत्मविश्वास और इच्छा शाक्ति बढ़ाने वाला होता है. वैवाहिक जीवन में पति पत्नी के बीच बढ़ती हुई दूरियों को कम करने में भी लाजवर्त श्रेष्ठ होता है. इसे धारण करने से इच्छाशक्ति भी बढ़ती है.