Sunday, 17 February 2013

प्रश्न ज्योतिष में संतान योग (Santan Yogas In Prashna Astrology)

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गृहस्थ जीवन की फुलवारी में बच्चे फूल के समान होते हैं. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जब उचित योग बनता है जब संतान प्राप्ति की संभावनायें अधिक होतीं है.
पति पत्नी अगर संतान के इच्छुक हैं और उन्हें यह सुख नहीं मिल रहा है तो प्रश्न ज्योतिष के अनुसार प्रश्न कुण्डली से देख सकते हैं (One can look for progeny related Yogas in the Prashna Kundali) कि उन्हें यह सुख कब प्राप्त होने की संभावनायें हो सकती हैं

गर्भावस्था के योग (Yogas for Pregnancy)
प्रश्न कुण्डली में लग्न और पंचम में शुभ ग्रह हो (If there is a benefic planet in the Ascendant and the fifth house) तो स्त्री गर्भवती होती है. सप्तमेश और पंचमेश लग्न या पंचम स्थान मे हो तब भी स्त्री गर्भवती होती है. लग्न,पंचम एवं एकादश स्थान मे शुभ ग्रह हो (A benefic planet is in the Ascendant, 11th or 5th) तो स्त्री के गर्भावती होने की सम्भावना बनती है. शुक्र, लग्न अथवा पंचम भाव मे स्थित हो अथवा दृष्टि डालता हो तो गर्भधारण की सम्भावना होती है. पंचम भाव मे लग्नेश और चंद्र गर्भावस्था को सूचित करता है. प्रश्न के समय पंचम भाव मे और एकादश भाव मे शुभ ग्रह स्थित हो तो स्त्री गर्भावती होती है. लग्न मे बुध (Mercury in the Ascendant indicates pregnancy) यह संकेत देता है कि स्त्री गर्भवती है.

संतान शीघ्र होगा या विलम्ब से (Combinations for delayed or early child-birth)
प्रश्नकर्ता को शीघ्र संतान होगी यदि लग्नेश का कार्येश के साथ संबध हो (If there is a realtionship between the lagna-lord and the karya-lord the child will come early). इसी प्रकार लग्नेश पंचम भाव मे या पंचमेश लग्न मे या दोनो लग्न मे, पंचम भाव मे अथवा किसी शुभ भाव मे संयुक्त रुप से हो तो संतान सुख शीघ्र प्राप्त होता है. दूसरी ओर यदि लग्नेश और पंचमेश नक्त योग मे हो तब संतान प्राप्ति मे विलम्ब होता है।

जुड़वा बच्चो का जन्म (Astrology Yogas for birth of twins)
बच्चो के जन्म से संबन्धित प्रश्न मे शुभ ग्रहो द्वारा द्विस्वभाव लग्न जुड़वा बच्चो का संकेत देता है (Ascendant of a dual sign indicates twin children). द्विस्वभाव राशि अथवा नवांश मे स्थित चन्द्र , शुक्र अथवा मंगल, बुध से दृष्ट होने पर भी जुड़वा बच्चो की सम्भावना होती है. यदि ये ग्रह विषम भाव और द्विस्वभाव राशि मे स्थित है तब दो पुत्र होने का योग बनता है.

स्वस्थ बच्चे का जन्म (Birth of a healthy child)
लग्न, स्वराशि अथवा उच्च राशि मे पंचमेश, चन्द्र अथवा शुभ ग्रह स्वस्थ बच्चे के जन्म का संकेत देते है (Well placed benefic planets indicate healthy child). इसी प्रकार जब पंचमेश चन्द्र अथवा शुभ ग्रह पंचम भाव मे स्थित हो अथवा पंचम भाव को देखते हो तो यह माना जाता है की स्वस्थ बच्चे का जन्म होगा. शुभ ग्रहो से दृष्ट द्वादशेश अथवा चन्द्र केन्द्र मे हो तब भी स्वस्थ बच्चे के जन्म की सम्भावना बनती है. शुक्ल पक्ष के दौरान पूछे गए प्रश्न मे यदि द्वादश भाव मे शुभ ग्रहो के साथ चन्द्र हो तब भी बच्चा स्वस्थ जन्म लेता है.

बच्चा गोद लेना (Adopting Child)
पंचम भाव पूर्व पुण्य अथवा पिछले जीवन के शुभ कर्मो का भाव है. यदि पंचम भाव मे बुध या शनि हो तो बच्चा गोद लेने की सम्भावनाएं होती है (If there is Mercury or Saturn in the fifth lord, there are chances of adoption). प्रश्न कुण्डली के अष्टम भाव में अगर नवमेश शनि स्थित हो तो वह दशम दृष्टि से पंचम को देखता है जिससे बच्चा गोद लेने की संभावना बनती है.
 

क्या है प्रश्न ज्योतिष (What is Prashna Astrology)

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प्रश्न ज्योतिष, ज्योतिष कि वह कला है जिससे आप अपने मन की कार्यसिद्धि को जान सकते है. कोई घटना घटित होगी या नहीं, यह जानने के लिए प्रश्न लग्न देखा जाता है (The prashna lagna is considered to judge the results of a query).
प्रश्न ज्योतिष मै उदित लगन के विषय में कहा जाता है कि लग्न मै उदित राशि (The rising sign is very important in Horary astrology) के अंश अपना विशेष महत्व रखते है. प्रश्न ज्योतिष में प्रत्येक भाव, प्रत्येक राशि अपना विशेष अर्थ रखती है. ज्योतिष की इस विधा में लग्न में उदित लग्न, प्रश्न करने वाला स्वयं होता है.
सप्तम भाव उस विषय वस्तु के विषय का बोध कराता है जिसके बारे मे प्रश्न किया जाता है. प्रश्न किस विषय से सम्बन्धित है यह जानने के लिये जो ग्रह लग्न को पूर्ण दृष्टि से देखता है, उस ग्रह से जुड़ा प्रश्न हो सकता है (The query maybe related to the planet that has a full aspect on the ascendant) या जो ग्रह कुण्डली मै बलवान हो लग्नेश से सम्बन्ध बनाये उस ग्रह से जुडा प्रश्न हो सकता है. प्रश्न कुण्डली में प्रश्न का समय बहुत मायने रखता है, इसलिए प्रश्न का समय कैसे निर्धारित किया जाता है इसे अहम विषय माना जा सकता है.
प्रश्न ज्योतिष में समय निर्धारण (Determination of the Prashna Time)
प्रश्न समय निर्धारण के विषय में प्रश्न कुण्डली का नियम है कि जब प्रश्नकर्ता के मन में प्रश्न उत्पन्न हो वही प्रश्न का सही समय है

जैसे- प्रश्नकर्ता ने फोन किया और उस समय ज्योतिषी ने जो समय प्रश्नकर्ता को दिया, इन दोनो मे वह समय लिया जायेगा जिस समय ज्योतिषी ने फोन सुना, वही प्रश्न कुण्डली का समय है.
इसी प्रकार प्रश्नकर्ता आगरा से फोन करता है, और ज्योतिषी दिल्ली में फोन से प्रश्न सुनता है. इस स्थिति में प्रश्न कुण्डली का स्थान दिल्ली होगा. प्रश्न कुण्डली का प्रयोग आज के समय में और भी ज्यादा हो गया है.
कई प्रश्नो का जवाब जन्म कुण्डली से देखना मुश्किल होता है, जबकि प्रश्न कुन्ड्ली से उन्हे आसानी से देखा जा सकता है. प्रश्न कुण्डली से जाना जा सकता है कि अमुक इच्छा पूरी होगी या नहीं (The prashna kundali can reveal whether a desire will be fulfilled). प्रश्न कुण्डली से उन प्रश्नो का भी जवाब पाया जा सकता है जिसका जवाब हां या ना में दिया जा सकता है जैसे अमुक मामले में जीत होगी या हार, बीमार व्यक्ति स्वस्थ होगा या नहीं, घर से गया व्यक्ति वापस लौटेगा या नहीं. इतना ही नहीं प्रश्न कुण्डली से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि खोया सामान मिलेगा अथवा नहीं.
प्रश्न कुण्डली में भावो का स्थान (The importance of Houses in Prashna Kundali)
जन्म कुण्डली की तरह प्रश्न ज्योतिष में भी लग्न को प्रमुख माना जाता है. लग्न की रशि, अंश, प्रश्न ओर प्रश्नकर्ता का विवरण देते है. प्रथम भाव प्रश्नकर्ता है, सप्तम भाव जिसके विषय मे प्रश्न किया गया है वह है. दूसरा भाव जिसके विषय मे प्रश्न किया गया है उसकी आयु है. अलग-अलग प्रश्नो के लिए भाव का अर्थ बदल जाता है. जब लग्न का सम्बन्ध, सम्बन्धित भाव से आये तो कार्यसिद्धि मानी जाती है.
प्रश्न कुण्डली मे राशियों का स्थान (Importance of Signs in Horary astrology)
प्रश्न ज्योतिष मे राशियो का वर्गीकरण यहाँ यह बताता है कि शिरशोदय राशियाँ प्रश्न कि सफलता बताती है और पृष्टोदय राशियाँ प्रश्न की असफलता कि ओर इशारा करती है, सामान्य प्रश्नों में लग्न में शुभ ग्रह का होना, अच्छा माना जाता है, और अशुभ ग्रह का बैठना अशुभ. लग्न को शुभ ग्रह देखे तो प्रश्न कि सफलता कि ओर कदम कह सकते है. इसी प्रकार दिवाबली राशि (Signs of the day) शुभ प्रश्न कि ओर इशारा करती है जबकि रात्रिबली राशि (Ratribali Rashis) अशुभ विषय से सम्बन्धित प्रश्न को दर्शाती है. प्रश्न कुण्डली को जन्म कुण्डली की पूरक कुण्डली माना जा सकता है.
अपने प्रश्न कि पुष्टि के लिए प्रश्न के योग को जन्म कुण्डली में भी देखा जा सकता है जैसे- लग्न मै चर राशि का उदय होना यह बताता है कि स्थिति बदलने वाली है और स्थिर राशि यह बताती है कि जो है वही बना रहेगा, अर्थात यात्रा के प्रश्न में लग्न में चर राशि होने पर यात्रा होगी और स्थिर राशि होने पर नहीं होगी तथा द्विस्वभाव होने पर लग्न के अंशो पर ध्यान दिया जाता है, 00 से 150 तक स्थिर राशि के समान होगा, अन्यथा चर राशि के समान होगा. प्रश्न कि सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है, कि लग्न, लग्नेश, भाव, भावेश का सम्बन्ध जितना अधिक होगा, कार्यसिद्धि उतनी जल्द होगी.

प्रश्न मन कि इच्छा है, प्रश्नकर्ता कि जो इच्छा है वह  प्रश्नकर्ता के पक्ष मै है या नहीं यह प्रश्नन से देखा जाता है जैसे यात्रा के प्रश्न में प्रश्नकर्ता यात्रा चाहता है और प्रश्न कुण्डली में भी यह आता है तभी कहा जाता है कि व्यक्ति यात्रा करेगा, अन्यथा नहीं. प्रश्न कुण्डली में हार जीत का प्रश्न एक ऐसा प्रश्न है जिसमें लग्न में शुभ ग्रह का होना अशुभ फल देता है जबकि अशुभ अथवा क्रूर ग्रह का परिणाम शुभ होता है. यहां विचारणीय तथ्य यह है कि अगर लग्न एवं सप्तम भाव दोनों ही में अशुभ ग्रह बैठे हों तो अंशों से फल को देखा जाता है.
भाव और कार्येस में सम्बन्ध (The relationship between the house and the Karak Lord)
भावो कि संख्या कुण्डली मे 12 है. जन्म कुण्डली मे प्रत्येक भाव स्थिर है और सभी का अपना महत्व है. प्रश्न कुण्डली में किस भाव से क्या देखना है यह प्रश्न पर निर्भर करता है. प्रश्न कुण्डली मे कार्येश वह है जिसके विषय मे प्रश्न किया गया है जैसे- विवाह के प्रश्न मे सप्तम भाव का स्वामी (भावेश ) कार्येश है. इसी प्रकार सन्तान के प्रश्न मे पंचमेश कार्येश है. प्रश्न कुण्डली मे प्रश्न की सफलता के लिए भावेश ओर कार्येश मे सम्बन्ध देखा जाता है. इन दोनो मे जितना दृष्टि सम्बन्ध हो, ये दोनो अंशो मे जितने निकट हो उतना ही अच्छा माना जाता है. यदि ये दोनो लग्न, लग्नेश, चंद्र, और गुरु से सम्बन्ध बनाये तो उत्तर साकारात्मक होगा, अन्यथा नही.

विवाह से पूर्व प्रश्न कुण्डली से जानिए भावी दम्पत्ति का स्वभाव (Know the nature of the married couple through Horary astrology)

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विवाह के बाद पति पत्नी में उनके व्यवहार और स्वभाव को लेकर बात बहुत आगे बढ़ जाती है. प्रश्न कुण्डली से लड़का लड़की का स्वभाव अगर विवाह से पहले ही देख लिया जाए तो विवाह के बाद आने वाली कई परेशानियों से बचाव हो सकता है.
विवाह के लिए लड़का लड़की की कुण्डली में ग्रह स्थिति (Placement of planets in the kundalis)
विवाह के लिए कुण्डली में गुरू और शुक्र को कारण ग्रह के रूप में देखा जाता है. प्रश्न कुण्डली में इस विषय के लिए पुरूष की कुण्डली में शुक्र और चन्द्र को देखा जाता है और स्त्री की कुण्डली में सूर्य और मंगल को देखा जाता है. अगर इनकी स्थिति शुभ कुण्डली में शुभ नहीं है तो वैवाहिक जीवन में कठिनाई का संकेत प्राप्त होता है. व्यक्ति के स्वभाव और चरित्र को लग्न से देखा जाता है (Ascendant is analysed to predict the person's nature) एवं वैवाहिक जीवन की स्थितियों को सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव से देखा जाता है. अगर कुण्डली में सप्तम, एकादश और द्वितीय भाव अशुभ प्रभाव में हो और लग्न में पाप ग्रह हो अथवा सप्तम में पाप ग्रह स्थित हो कर लग्न को देख रहा हो तब व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव वैवाहिक जीवन में परेशानियों का कारण होता है. विवाह के संदर्भ में मंगल भी काफी महत्वपूर्ण होता है. इसकी दृष्टि और उपस्थिति भी कई बार वैवाहिक सुख में व्यवधान का कारण होता है.

प्रश्न कुण्डली में लड़का लड़की का का स्वभाव और चरित्र (The character and nature of the persons through Prashna Kundali)
प्रश्न कुण्डली में कुछ ऐसे ग्रह स्थितियों का वर्णन किया गया है जिन्हें देखकर इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि व्यक्ति का स्वभाव और चरित्र कैसा है. प्रश्न कुण्डली के अनुसार जब लड़का लड़की के चरित्र के विषय में जानने के लिए प्रश्न पूछा जाता है तब कुण्डली में अगर मंगल और शुक्र की युति बनती है अथवा शुक्र और मंगल के बीच दृष्टि सम्बन्ध बनता है तो यह इस बात का संकेत होता है कि अपने चरित्र और व्यवहार के कारण वैवाहिक जीवन में पति पत्नी एक दूसरे के प्रति पूर्ण समर्पित नहीं होंगे. चन्द्रमा सातवें घर में मंगल और राहु के साथ बैठा हो (when moon is in the seventh house with mars and rahu) और सप्तमेश एवं शुक्र पर मंगल अथवा शनि की अशुभ दृष्टि हो तो पति पत्नी में नैतिकता का अभाव होता है. द्वितीय, छठे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव के स्वामी कुण्डली में कहीं भी युति बनाते है तो चंचल स्वभाव का संकेत मिलता है. पति पत्नी में समर्पण भाव का अभाव उस स्थिति में भी होता है जब बुध और शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होती है और चतुर्थ भाव को शनि देख रहा होता हो.



पति पत्नी के चरित्र के विषय में प्रश्न कुण्डली का उदाहरण (Example of marriage from the prashna kundali)
मनोज की शादी की बात काफी हद तक आगे बढ़ चुकी थी. लेकिन मनोज के माता पिता के मन में यह बात घूम रही थी कि पता नहीं लड़की कैसी और उसका स्वभाव कैसा है. अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए इन्होंने प्रश्न कुण्डली से इस विषय का उत्तर जानना चाहा. 23 मई 2009 को 5 बजकर 12 मिनट पर इन्होंने अपना प्रश्न किया किया. लग्न निर्धारण के लिए इन्होंने कृष्णमूर्ति पद्धति से 1 से 249 तक दिये गये अंक में अंक 19 को चुना और वैदिक पद्धति के अनुसार 1 से 108 मे अंक 7 को चुना. इस प्रकार इनकी प्रश्न कुण्डली तैयार हुई. कुण्डली में लग्न आया तुला जिसका स्वामी है शुक्र. राशि है मेष जिसका स्वामी है मंगल.  नक्षत्र है भरणी जिसका स्वामी है शुक्र. इनकी प्रश्न कुण्डली में छठे भाव में मंगल और शुक्र की युति बन रही है. लग्न भाव में शनि की दृष्टि है. तुला लग्न की कुण्डली होने से शनि अपनी अशुभता नहीं देगा लेकिन छठे भाव में शुक्र मंगल की युति के कारण पति पत्नी दोनों ही स्वतंत्र विचार के होंगे

कालांश और विंशोत्तरी दशा में सम्बन्ध (Relationship between Kalansha and Vimshottari Dasha)

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आधुनिक ज्योतिष परम्परा में कृष्णमू्र्ति महोदय ने एक नयी विधा को जन्म दिया है। यह विधा वैदिक ज्योतिष के मूलभूत सिद्धांतों का अनुपालन करता है लेकिन फिर भी यह कुछ बातों में वैदिक ज्योतिष से अलग मत रखता है।
सामान्यतौर पर बात करें तो जहां मूल वैदिक ज्योतिष राशियों को आधार मानकर फलादेश करता है वहीं कृष्णमूर्ति महोदय की ज्योतिष पद्धति नक्षत्रों को महिमा मंडित करता है (Vedic Jyotish depends on Moon sign and the Krishnamurthy system is based on the Nakshatra)।
कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्रों के विभाजन में जिस सिद्धांत को अपनाया गया है वह वैदिक ज्योतिष के विंशोत्तरी दशा पर आधारित है (In Krishnamoorthy system, divison of Nakshatra is done on the basis of Vimshottari Dasha)। इस आधार पर देखा जाय तो कृष्णमूर्ति महोदय के कालांश और वैदिक ज्योतिष के विंशोत्तरी दशा के बीच निकट सम्बन्ध है। के.पी. महोदय की प्रणाली में नक्षत्रों की अवधि 13डिग्री 20 मिनट को 9 सूक्ष्म भागों में वांटा है।  इन सभी भागों का स्वामी अलग अलग ग्रह होता है। विंशोत्तरी दशा में जिस ग्रह का कालावधि जितना होता है उसी अनुपात में ग्रहों का समय निश्चित किया गया है। समय का यह अंश कालांश कहा गया है और इसके स्वमी को कालांश स्वामी के नाम से सम्बोधित किया गया है।

विंशोत्तरी दशा में व्यक्ति की मानक आयु 120 वर्ष है (According to Vimshottari Dasha average Human life span is 120 years) । इन वर्षों में व्यक्ति को विभिन्न ग्रहों की दशाओं से गुजरना होता है। हर ग्रह की एक निश्चित अवधि होती है और उस अवधि में उस ग्रह के प्रभाव के अनुरूप व्यक्ति को फलाफल मिलता है। के. पी. पद्धति में भी इसी प्रकार के सिद्धांत का अनुपालन किया गया है।  इसमें फलित के निकट पहुंचने के लिए एक गणितिय विधि का प्रयोग किया गया है जिसमें विंशोत्तरी दशा की कुल अवधि यानी 120 से नक्षत्रों की कुल अवधि यानी 13 डिग्री 20 को घंटे में ज्ञात कर यानी 800 में विंशोत्तरी दशा में मौजूद ग्रहों की दशा के वर्ष से गुणा किया जाता है। इस गणितिय विधि से जो अंक प्राप्त होता है वह कालांश क्षेत्र या ग्रहों का उपक्षेत्र कहलाता है। 
उपरोक्त तथ्यों को आप इस प्रकार समझ सकते हैं।       
                                   800
ग्रहों की दशा का वर्ष  x  ---------    =  ग्रहों का उपक्षेत्र या कालांश क्षेत्र
                                  120
इस प्रकार कृष्णमूर्ति पद्धति में विभिन्न ग्रहों की दशा, विंशोत्तरी दशा के आधार पर निर्धारित की गई है और दोनों में काफी कुछ समानता है। कृष्णमूर्ति पद्धति में ग्रहों के कालांश क्षेत्र में कमी होने से प्राचीन वैदिक ज्योतिष प्रणाली की तरह इस नवीन पद्धति से भी फलादेश सटीक ज्ञात किया जा सकता है। 
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कृष्णमूर्ति पद्धति का आधार है वैदिक ज्योतिष (Krishnamoorthy system is based on Vedic Jyotish)

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भारतीय ज्योतिष विधा में वैदिक ज्योतिष सबसे प्राचीन और प्रमाणिक माना जाता है (Vedic Astrology is the father of all new Astrology System)। कृष्णमूर्ति पद्धति भी वैदिक ज्योतिष पर आधारित है कैसे और कहां तक यहां इन्हीं बातों का जिक्र किया जा रहा है।
वैदिक ज्योतिष को आधार मानकर आज भी ज्योतिषशास्त्री इसके विभिन्न विषयों को लेकर प्रयोग करते रहते हैं। ज्योतिष की कृष्णमूर्ति पद्धति जिसका प्रादुर्भाव दक्षिण भारत में हुआ है, यह भी वैदिक ज्योतिष पर ही आधारित है। कृष्णमूर्ति पद्धति को लेकर वैदिक ज्योतिष में आस्था रखने वाले ज्योतिषशास्त्रियों में यह भ्रम बना हुआ है कि यह प्रमाणिक नहीं है क्योंकि यह वैदिक ज्योतिष पर आधारित नहीं है। वैसे ज्योतिषशास्त्री जो इस तरह की विचारधारा रखते हैं उन्हें यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि कृष्णमूर्ति भी वैदिक ज्योतिष के मानने वालों में से हैं। उन्हेंने फलादेश को वास्तविकता के निकट लाने हेतु इसमें प्रयोग किया है। यह प्रयोग क्या है और यह किस प्रकार वैदिक ज्योतिष से सम्बन्ध रखता है यहां इसी विषय पर हम विचार कर रहे हैं।
वैदिक ज्योतिष में राशि को प्रमुखता दी गई है और फलादेश के लिए राशियों का विभाजन 30 डिग्री पर किया गया है। इसके अलावा वैदिक ज्योतिष पद्धति में भचक्र (राशिचक्र) को 27 भागों में विभक्त किया गया है और नक्षत्रों का निर्माण किया गया है। श्री कृष्णमूर्ती ने नक्षत्रों पर शोध किया, और पाया कि इनके ज़रिये सटीक फलादेश किया जा सकता है।

उन्होंने नक्षत्रों के विंशोत्तरी दशा से संबंध की खोज की, और अपनी पद्धति में उसका समावेश किया (Krishnamurthi relates Nakshatra to Vimsottari Dasha)। विंशोत्तरी दशा में व्यक्ति के जीवनकाल को 120 वर्षों का माना गया है। इसमें यह माना गया है कि इस दौरान व्यक्ति पर भिन्न ग्रहों का प्रभाव रहता है, जिसके अनुसार उसे फल प्राप्त होता है। मान लीजिए आपका जन्म सूर्य की विंशोत्तरी दशा में हुआ है जिसकी अवधि 6 वर्ष की होती है तो आपको सूर्य के बाद आने वाले ग्रहो की दशा से गुजरना होता है जैसे चन्द्र, मंगल से लेकर शुक्र तक। विंशोत्तरी दशा चक्र (Vimsottari Dasha Chakra) को समझने के लिए आप दिये गये चार्ट को देखकर विषय को और भी अच्छी तरह समझ सकते हैं।
कृष्णमूर्ति महोदय अपनी पद्धति में फलादेश की निकटता तक पहुंचने के लिए वैदिक ज्योतिष के सूक्ष्म से अतिसूक्ष्म की ओर जाने की बात करते हैं (Krishnamurthy system attempts to access the microcosm)। यही कारण है कि इन्होंने राशि के बदले नक्षत्रों को प्रमुखता दिया है।
वैदिक ज्योतिष की पुरानी पद्धति में हम सूक्ष्म फल कथन के लिये नवांश का इस्तेमाल करते हैं, जो की राशि का नौंवा हिस्सा है (Navamsa is ninth part of zodiac sign)। इन्होंने राशि के बदले नक्षत्रों को 9 भागों में विभाजित किया है अर्थात 13 डिग्री 20 मिनट को नौ भागों में बांटा गया है (Krshnamoorthy divides  Nakshatra in nine part but this division is not equal)। लेकिन यह विभाजन भी समान नहीं है इसमें विंशोंत्तरी दशा में ग्रहों की अवधि के आधार पर विभाजन किया गया है जिससे कालांश का जन्म हुआ है। यानी वैदिक ज्योतिष से थोड़ा हटकर इन्हें नवमांश के बदले कालांश को अपनाया है।
कालांश के कारण इस विधि से अगर फलादेश किया जाता है तो सूक्ष्म घटनाओं का भी कथन हो सकता है। इस पद्धति में वैदिक ज्योतिष के अन्य तमाम विषयों एवं सिद्धांतों को वास्तविक रूप में स्वीकार किया गया है। वैदिक ज्योतिष में आस्था रखने वाले ज्योतिषशास्त्री अगर इस पद्धति से वैदिक ज्योतिष के फलादेश को निकालने की कोशिश करें तो उन्हें निश्चित ही सुपरिणाम प्राप्त होंगे।
निष्कर्ष के तौर पर यही कह सकते हैं कि वैदिक ज्योतिष देव स्वरूप है जिसके निकट पहुंचने के लिए आप राशि पद्धति नवमांश को अपनाएं या कृष्णमूर्ति के नक्षत्र पद्धति यानी कालांश को, मकशद जातक के जीवन के सम्बन्ध में फलादेश के निकट पहुंचना है।
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नवमांश और कालांश में विभेद (Difference between Navamansha & Kalamsha)

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प्राचीन काल के ऋषियों के विषय में कहा जाता है कि वे त्रि-कालदर्शी होते थे। त्रि -कालदर्शी अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों पर उनकी दृष्टि रहती थी। आज वक्त बदल गया है और हमारी जीवनशैली में भी काफी बदलाव आ गया है। अब न तो हमारे पास धैर्य है और न तो इतनी साधना करने का साहस है।
आज भूत, भविष्य तो क्या वर्तमान को समझना भी हम लोगों के लिए कठिन हो गया है। इस स्थिति में परम पिता ब्रह्मा द्वारा प्रदान किया गया वेद और उसमें वर्णित ज्योतिष हमारे लिए बहुत ही लाभप्रद और उपयोगी है। वैदिक ज्योतिष की इस महान विधा से व्यक्ति के जीवन की सभी घटनाओ की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
वैदिक ज्योतिष अपने आप में रहस्य का भंडार है (Vedic Astrology is a mystery)। वैदिक ज्योतिष की गूढ़ता को कम करने और नई पीढियों के लिए इसे और भी आसान बनाने व सटीक फलादेश के लिए हर युग में महान ज्योतिषशास्त्रियों ने शोध किये जिससे कई नये तथ्य उभरकर सामने आये। 20वीं सदी के महान दक्षिण भारतीय ज्योतिषशास्त्री कृष्णमूर्ति महोदय ने एक ऐसी पद्धति को जन्म दिया जो कृष्णमूर्ति पद्धति के नाम से जानी जाती है (Legendary South Indian Astrologer Krishnamoorthy developed an Astrological system that is called Krishnamoorthy System)। इस पद्धति में सटीक फलादेश तक पहुंचने के लिए नवमांश की जगह कालांश से गणना की जाती है (In Krishnamoorthy system Kalamsa replaces Navmansha)।

नवमांश और कालांश दोनो का आधार वैदिक ज्योतिष है परंतु फिर भी इनके मध्य कई अंतर हैं (Navmasha and kalmasha theories are established on Vedic Jyotish but there are some differences between them.)। कालांश किस प्रकार नवमांश से अलग है इसे समझने के लिए आप कुछ तथ्यों पर दृष्टि डाल सकते हैं। सबसे पहली बात तो यह की नवमांश राशियों का विभाजन है, और कालांश नक्षत्रों का (Navmasha is the division of Sign while Kalmasha is of Nakshatra)।
ज्योतिष के प्राचीन वैदिक रूप में हम सूक्ष्म घटनाओं की जानकारी के लिये नवमांश का ही उपयोग करते आये हैं। लेकिन श्री कृष्णमूर्ति ने राशि के बजाय नक्षत्रों के भाग करने की नयी पद्धति विकसित की, जिसके द्वारा और भी सूक्ष्म घटनायें ज्ञात हो सकती हैं। नवमांश में राशि को, और कालांश में नक्षत्र को नौ भागों में बांटा जाता है।
आइये अब इस फर्क को पूर्ण रूप से समझें। नवमांश में एक राशि की अवधि  - 30 डिग्री को 9 बराबर भागों में बाँटा गया है। जिससे हर नवमांश 3 डिग्री 20 मिनट का होता है। नवमांश के सिद्धान्तो से हटकर कालांश नक्षत्रों के 13 डिग्री 20 मिनटों को 9 भागों में बांटता है। लेकिन यह भाग बराबर नहीं है। हर कालांश का स्वामी एक ग्रह बनाया गया है, और उस ग्रह की अवधि विंशोत्तरी दशा के अनुरूप ली गयी है। चुंकि विंशोत्तरी दशा में विभिन्न ग्रहों की अवधि अलग अलग होती है (Period of planet is different in Vimshottari Dasha)। इसलिए कालांश भी एक समान नहीं होते, अर्थात हर कालांश का मान अलग अलग होता है। 
सबसे छोटा कालांश 4 मिनट का, व सबसे बड़ा 2 डिग्री 13 मिनट 20 सेकेन्ड का होता है। कालांश मापक में बहुत छोटा भी हो सकता है जिसके कारण इससे फलादेश वास्तविकता के निकट होता है।
नवमांश और कालांश में संख्याओं का भी अंतर होता है। नवमांश कुल 108 होते हैं जबकि कालांश की कुल संख्या 249 होती है (Navmansh are 108 in number while Kalansha are 249 in number)। आप सोच रहे होंगे कि राशियों की कुल संख्या 12 होती है और 9 से विभाजित होने पर इनकी संख्या 108 होती है फिर नक्षत्र 27 हैं और 9 से विभाजन करने पर 243 कालांश होते हैं तो 6 अतिरिक्त कालांश कैसे आ गये। इस प्रश्न का जवाब यह है कि इस पद्धति में कुछ नक्षत्रों के चरण यानी पद अलग अलग राशियों में होते है जैसे मान लीजिए हम चन्द्र का कालांश लेते हैं इसके नक्षत्र के चरण एक राशि में नहीं होते बल्कि कई राशियों से गुजरते हैं जैसे मिथुन, तुला, कुम्भ इसी प्रकार कर्क, वृश्चिक और मीन राशि से। इस प्रकार विभिन्न राशियों में चरण होने से कालांश में 6 जुट जाते हैं।
कृष्णमूर्ति पद्धति में हर कालांश का स्वामित्व ग्रह को दिया गया है, और यह समझा जाता है कि उस कालांश का फल उस ग्रह के अनुसार होग।

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नवग्रह रत्न माणिक्य और मूंगा (Gemstone Ruby and Coral)

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रत्न खूबसूरत पत्थर होते हैं जिनमें काफी घनत्व होता है.ये विभिन्न रंगों में पाये जाते हैं.अपने गुणों एवं चमत्कारी प्रभाव के कारण ये रत्न कहलाते हैं.नवग्रहों से सम्बन्धित होने के कारण इन्हें नवरत्न कहा जाता है.इनकी संख्या काफी है परंतु भारतीय ज्योतिष में 84 रत्नो को ही मान्यता प्राप्त है.
माणिक्य की विशेषता (Speciality of Rubies)
माणिक्य का लाल रंग की आभा लिये होता है.यह अन्य रंगों जैसे गुलाबी, काला और नीले रंग में भी पाया जाता है.यह अत्यंत कड़ा होता है.पृथ्वी पर पाये जाने वाले खनिजों में सिर्फ हीरा ही इससे कठोर होता है.जो माणिक्य सूर्य की पहली किरण पड़ने पर लाल रंग बिखेरता है वह सर्वोत्तम होता है.उत्तम माणिक्य की पहचान है कि अगर इसे दूध में 100 बार डुबोते हैं तो दूध मे भी माणिक्य की आभा दिखने लगती है.अंधेरे कमरे में रखने पर यह सूर्य के समान प्रकाशमान होता है.इसे पत्थर पर रगड़े तो इसपर घर्षण के निशान आ जाते हैं लेकिन वजन में कमी नहीं आती है.
माणिक्य धारण करने से लाभ (Benefit of wearing Ruby)
माणिक्य को प्रेम का रत्न भी कहा जाता है क्योकि इसे धारण करने से मन में उत्साह और उमंग बढ़ता है.यह मायूसी और उदासीनता को दूर करता है.ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह प्रेत बाधा से मुक्ति प्रदान करने वाला होता है.इस रत्न को धारण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है.आर्थिक परेशानी की स्थिति में यह धन प्रदायक होता है.माणिक्य धारण करने वाला व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठित होता है.मान्यताओ के अनुसार जो व्यक्ति इसे धारण करता है उसके ऊपर संकट आने पर इसका रंग फीका हो जाता है और संकट टल जाने पर पुन: इसकी आभा लौट आती है.माणिक्य के विषय में यह भी मान्यता है कि यह जहर के प्रभाव को कम करता है एवं जहरीली चीज़ पास होने पर इसक रंग फीका पड़ जाता है.

मूंगा की विशेषता (Characteristics of Coral)मूंगा गुलाबी, काला, सुनहरे रंग का भी पाया जाता है परंतु आमतौर पर जो मूंगा पाया जाता है वह लाल रंग का होता है.लाल मूंगा स्त्रियों के लिए बहुत ही भाग्यशाली माना जाता है.इस रत्न को बहुत ही शुभ कहा गया है.प्राचीन रोमनवासी इसे अलंकार के अलावा तावीज़ के रूप में भी धारण करते थे क्योंकि यह रत्न व्यक्ति में साहस और वीरता का संचार करने वाला होता है.
मूंगा धारण करने से लाभ (Benefits of wearing Coral)मान्यताओं के अनुसार सुहागिन स्त्रियों को मूंगा धारण करने से सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है.जिन लोगों को रात में बुरे बुरे सपने आते हैं और भूत प्रेत का भय होता है उन्हें मूंगा धारण करने से लाभ होता है.जिनकी कुण्डली में मंगल कमजोर अथवा पीड़ित होता है उन्हें मूंगा धारण करने से कई प्रकार की परेशानियों से राहत मिलती है.मूंगा के विषय में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार जो व्यक्ति इसे धारण करता है वह अगर रोग से पीड़ित होता है तो इसके रंग में बदलाव आने लगता है, जो व्यक्ति के स्वस्थ होने पर पुन: वास्तविक रंग में लौट आता है.बौद्ध अभिलेखों में मूंगा के विषय में कहा गया है कि यह मानसिक रोग को दूर करने वाला है.यह बौद्धिक क्षमता को बढ़ता है.मूंगा का ताबीज रक्त स्राव को रोकने में कारगर होता है.
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