Sunday, 17 February 2013

मान सम्मान के संदर्भ में क्या कहती है प्रश्न कुण्डली (Prashna kundli on honour and respect)

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एक लोकोक्ति है कि धन गया कुछ न गया, मान गया तो सब गया. धन तो आप किसी भी तरह कैसे भी कार्य करके अर्जित कर सकते हैं परंतु मान सम्मान आसानी से नसीब नहीं होता है.
मान सम्मान वह चीज़ है जो धरती से चले जाने के बाद भी कायम रहता है. आखिरी सांस में भी हम इसे अपने साथ लेकर जाना चाहते हैं, इस प्रयास में कु्छ विरले की कामयाब हो पाते हैं. जीवन में कई प्रकार की परिस्थितयों से हमें रूबरू होना पड़ता है, जिनसे कभी तो हमें मान सम्मान मिलता है तो कभी आहत पहुंचता है. ज्योतिष कहता है कि हमें इस धरती पर जो मान सम्मान मिलता है वह हमें हमारी कुण्डली में स्थित ग्रहों के प्रभाव से मिलता है. ज्योतिष के अनुसार प्रश्न कुण्डली में मान सम्मान के लिए दशम भाव(Tenth house says about honour and respect) से विचार किया जाता है. प्रश्न कुण्डली में दशम भाव/ दशमेश शुभ (Tenth house/Lord of tenth house) स्थिति में हों तो आपको समाज से मान सम्मान प्राप्त होता है साथ ही आपको सरकारी क्षेत्र से भी आदर सम्मान प्राप्त होता है.

दशम भाव के विषय में यह कहा जाता है कि इसमें चाहे शुभ ग्रह हों अथवा अशुभ ग्रह दोनों ही स्थिति में आपको अनुकूल फल की प्राप्ति होती है. दशम भाव में विभिन्न ग्रहों की स्थिति के अनुसार मान सम्मान पर विचार करें तो पाते हैं कि इस भाव में सूर्य की स्थिति (Sun in tenth house) होने से आपको सरकारी क्षेत्र में मान सम्मान के साथ साथ लाभ मिलता है क्योंकि इस भाव में सूर्य काफी शाक्तिशाली होता है. चन्द्रमा के दशम भाव में (Moon in tenth house) होने से आपको समाज में प्रतिष्ठा व आदर प्राप्त होता है. सूर्य के समान दशम भाव में मंगल (Mars in tenth house) भी बली होता है जो आपको समाज में उच्च पद एवं सम्मान दिलाता है. दशम भाव में शनि, राहु, केतु (Saturn, Rahu. Ketu in tenth house )की मौजूदगी से मान सम्मान के संदर्भ आपको क्या परिणाम प्राप्त होता है, इस पर एक दृष्टि डालते हैं. शनि इस भाव में होने से आपको कर्मयोगी बनाता है अर्थात आपसे काफी परिश्रम करवाता है. इस तरह की स्थिति होने से आप सेवा भाव रखने वाले होते हैं तथा श्रमिक वर्ग में लोकप्रियता हासिल करते हैं. इस भाव में राहु (Rahu in tenth house) की उपस्थिति होने से आप राजनीति के क्षेत्र में यश पाते हैं, इस स्थिति के होने पर अगर आप प्रत्यक्ष रूप से राजनीति में नहीं भी हों तो राजनीतिज्ञों से अप्रत्यक्ष सम्बन्ध होने के कारण यश प्राप्त करते हैं. आध्यात्मिक क्षेत्र में मान-सम्मान के लिए दशम भाव में केतु (Ketu in tenth house) की उपस्थिति आवश्यक मानी गयी है. ज्योतिषविद मानते हैं कि दशम भाव में शुभ ग्रह शुभ स्थिति में होने से शुभ फल प्रदान करते हैं जबकि अशुभ स्थिति में होने से अशुभ परिणाम प्रदान करते हैं. भारतीय ज्योतिष परम्परा के अनुसार 1, 4, 7, 10 केन्द्रीय भाव (Kendra Bhava) कहे जाते हैं. 10 भाव केन्द्रीय भाव होने से यहां बुध और बृहस्पति (Mercury and Jupiter both are some extent afflicted in central place of chart) को कुछ दोष लगता है,

पंरतु ज्योतिशास्त्री कहते हैं कि प्रश्न कुण्डली में लग्न द्विस्वभाव (Ascendant is not dual nature in prashna kundali) का नहीं हो तो दशम भाव में दोनों ग्रह उत्तम फल देते हैं. शुक्र भी दशम भाव में कमजोर (Venus is debilitate in tenth house) होता है जिससे शुभ ग्रह बुध, शुक्र, गुरू दशम भाव में परिस्थिति के अनुसार फल देते हैं. दशम भाव को कर्म भाव (Tenth house is treated as karma bhava) माना गया है. व्यक्ति अपने कर्मों के द्वारा भी मान अथवा अपमान को प्राप्त करता है. मान सम्मान के संदर्भ में एवं प्रसिद्धि के लिए आपकी कुण्डली में दशम भाव/दशमेश के साथ ही लग्न/लग्नेश भी शुभ तथा बलवान स्थिति में होना आवश्यक कहा गया है. मान सम्मान के विषय में ज्योतिष का एक अन्य सिद्धान्त यह बताया जाता है कि केन्द्र स्थान (Cetral place in the chart) में शुभ ग्रह पीड़ित हो जाते हैं तथा पापी ग्रह फलदायी होते हैं. दशम भाव केन्द्र स्थान कहलता (Tenth house is said to be the central place in the chart) है जहां पापी ग्रह फलदायी होते हैं.
निष्कर्ष के तौर पर देखें तो प्रश्न कुण्डली से मान सम्मान के विषय में यही बात सामने उभरकर आती है कि दशम भाव में ग्रह शुभ हैं तो आपको शुभ फल प्राप्त होगा और अशुभ हैं तो मान सम्मान प्राप्त करने हेतु आपको काफी प्रयासरत रहना होगा.
 

जानिए धन की स्थिति प्रश्न कुण्डली से! (Prashna kundali on possession of wealth)

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संसार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो धन की अभिलाषा नहीं रखता हो। सन्यासी ही होंगे जिन्हें धन की अभिलाषा नहीं होती है।
गृहस्थ अर्थात सांसारिक जीवन व्यतीत करने वाला हर मनुष्य चाहता है कि उन्हें लक्ष्मी की कृपा दृष्टि प्राप्त हो। लक्ष्मी की कृपा की कामना भले ही हम सभी करें परंतु लक्ष्मी की दया हर किसी को बराबर नहीं मिलती है। अपनी आर्थिक समस्याओं से सम्बन्धित प्रश्नों को लेकर अक्सर हम आप ज्योतिषाचार्यों से सम्पर्क करते हैं। आप जब आर्थिक मुद्दों को लेकर ज्योतिषियों के पास जाते हैं तब वे किस प्रकार से फलादेश (Phaladesh) सुनाते हैं आईये इस पर दृष्टि डालते हैं।
ज्योतिर्विदों के मतानुसार धन के विषय में जब विचार करना होता है तब सभी भावों पर दृष्टि (Importance on all houses for considering wealth) रखनी होती है। धन के सम्बन्ध में हर भाव अलग अलग स्थिति बयां करता है जैसे प्रथम भाव स्वअर्जित धन का संकेत देता है तो द्वितीय भाव जमा पूंजी (Second house says about deposit and capital) के संदर्भ में बताता है.

इसी प्रकार तृतीय भाव (Third house) पराक्रम द्वारा अर्जित धन के विषय में, चतुर्थ भाव (Fourth house) से सम्पत्ति, पंचम भाव (Fifth house) से अकस्मात धन लाभ,षष्टम (Sixth house) से शत्रु से धन लाभ, सप्तम भाव (Seventh house) से व्यवसाय में धन लाभ, अष्टम भाव (8th house) से विरासत में प्राप्त धन, नवम भाव (Ninth house) से भाग्य द्वारा धन, दशम भाव (Tenth house) से नौकरी या सरकार से धन, एकादश भाव (11th house) से कार्य में धन लाभ तथा द्वादश भाव (12th house) से विदेश में धन लाभ का संकेत प्राप्त होता है।
इन तथ्यों से ज्ञात होता है कि हमारी कुण्डली के हर भाव में धन का संकेत होता है। धन का कारक बृहस्पति को (Jupiter is the significator of wealth) माना गया है, कुण्डली के किसी भी भाव में बृहस्पति बलवान होकर स्थित होने से धन का लाभ होता है। प्रश्न कुण्डली के अनुसार जब आप जानना चाहते हैं कि किस व्यक्ति से आपको धन लाभ मिलेगा, उस समय द्वितीय भाव(Second house) संकेत देता है कि आपको संयुक्त रूप से कुटुम्ब जन से धन प्राप्त होगा। तृतीय भाव (Third house) बतता है कि छोटे भाई/बहनों से धन मिलेगा। चतुर्थ भाव (4rth house) से माता या ससुर से धन मिलने का भान होता है तो पंचम भाव (5th house) से संतान से धन, षष्टम (Sixth house) से बैंक से कर्ज के रूप में धन, सप्तम (7th house) से पत्नी से धन, अष्टम भाव (8th house) से ससुराल से धन, नवम भाव(Ninth house) से साले/बहनोई से धन, एकादश (11th house) भाव से मित्र का धन तथा द्वादश भाव (12th house) से अनैतिक तरीके से धन लाभ का ज्ञान मिलता है। ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि किसी व्यक्ति से धन लाभ के संदर्भ में आपके भाव/भावेश (House/House Lord) के साथ ही कारक ग्रह भी बलवान होकर शुभ होना चाहिए, इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं मान लीजिए आपको अपने बड़े भाई या बड़ी बहन से धन लाभ देखना है तो इसके लिए एकादश भाव एवं एकादशेश के साथ ही इनके कारक गुरू के बल पर भी दृष्टि रखनी होगी। धन लाभ के विषय में दूसरे ग्रहों की एकादश भाव पर दृष्टि या भावेश के साथ युति या दृष्टि से भी विचार करना होता है। उपरोक्त भाव/ग्रहों का परिणाम संयुक्त रूप से अनुकूल आता है तो आपको धन का लाभ होता है। इस स्थिति में परिणाम प्रतिकूल आने से धन हानि होने की संभावना रहती है।

धन लाभ के संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि लग्न/लग्नेश शुभ (Auspiciousnes of Ascendant/Lord of Ascendant) होकर बलवान स्थिति में हों तो व्यक्ति स्वयं ही धन अर्जन करता है। धन लाभ की स्थिति के सम्बन्ध में नवम भाव/नवमेश का बलवान होना भी उत्तम माना जाता है।
तथ्यों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि धन के लाभ के लिए हमारी कुण्डली में काफी संभावनाएं हैं। अपनी प्रश्न कुण्डली को जानकर हम धन के संदर्भ में सकारात्मक प्रयास कर सकते हैं।
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इच्छा पूर्ण हो पाएगी अथवा नहीं जानिए प्रश्न कुण्डली से! (Fulfillment of desire through prashna kundali)

परिस्थितियों और लालसाओं के कारण हमारे अंदर इच्छाएं जन्म लेती रहती हैं, वास्तव में इच्छा आत्मा के समान अमर है जो कभी मरती नहीं है बल्कि स्वरूप बदल लेती है अर्थात जैसे ही आपकी एक इच्छा पूरी होती है दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है. हम मनुष्यों के पास शक्ति सीमित हैं और इच्छाएं अनंत इसलिए मजबूरीवश हम कई इच्छाओं को मन में ही दमित कर देते हैं, जब भी इच्छा प्रबल हो जाती हैं तो हम उसकी पूर्ति के संदर्भ में ज्योतिषियों से सम्पर्क करते हैं. ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि आपकी कौन सी इच्छा पूर्ण होगी और कौन सी नहीं यह आपकी कुण्डली में लिखा होता है. इस संदर्भ में प्रश्न कुण्डली बहुत ही उपयोगी (Relevance of prashna kundali for the fulfillment of human desire) है इससे इच्छा पूर्ति के सम्बन्ध में तुरंत फलादेश मिल जाता है. ज्योतिषशास्त्री बताते हैं कि प्रश्न कुण्डली में एकादश भाव से इच्छा के सम्बन्ध में विचार (Eleventh house determines the desire of man) किया जाता है तथा बृहस्पति को इच्छापूर्ति (Jupiter is said to be the desire fulfillment planent) का ग्रह माना जाता है. ज्योतिष सिद्धान्त के अनुसार एकादश/एकादशेश (Eleventh house/Lord of eleventh house), बृहस्पति (Jupiter) आपकी प्रश्न कुण्डली में शुभ होकर स्थित हों तो आपकी इच्छा पूरी होती हैं. इच्छापूर्ति से होने वाले लाभ के लिए आपकी कुण्डली में लग्न/लग्नेश का शुभ (Auspiciousness of ascendant/Lord of ascendant for fulfillment of desire is required) स्थिति में होना आवश्यक माना गया है. ज्योतिशास्त्रियों के अनुसार आपकी कुण्डली के एकादश भाव में जो ग्रह होते हैं उसके अनुरूप ही आपकी इच्छा साकार होती हैं. इस संदर्भ में विभिन्न ग्रहों की स्थिति से विचार करें तो इस भाव में सूर्य की उपस्थिति होने से सरकार और सरकारी तंत्र से सम्बन्धित इच्छाओं की पूर्ति होती है,

इसी प्रकार आपकी कुण्डली के एकादश भाव में चन्द्रमा (Moon in eleventh house) उपस्थित है तो आपकी समाजिक इच्छाएं पूरी होती हैं. मंगल (Mars in eleventh house) शुभ होकर उपस्थित होने से अगर आपके मन में किसी सम्मान एवं पद की प्राप्ति की इच्छा है तो आपकी इच्छा पूरी होती है क्योंकि इस भाव में मंगल शक्तिशाली होता है.
एकादश भाव में बुध (Mercury in eleventh house) की उपस्थिति इस बात का द्योतक है कि आपकी इच्छाएं बहुत जल्द पूरी होंगी और इसमें आपको मित्रों से सहयोग प्राप्त होगा। आप अगर स्त्री पक्ष से लाभ की इच्छा रखते हैं तो आपकी कुण्डली के इस भाव में शुक्र (Venus in eleventh house) की उपस्थिति आवश्यक है, शुक्र के इस भाव में उपस्थित होने से महिला अधिकारी से भी आपको लाभ मिलता है।
शनि की उपस्थिति (Saturn in eleventh house) से आपकी इच्छाएं पूरी होती हैं परंतु इसके लिए आपको काफी परिश्रम करना होता है. अगर आप राजनीति के क्षेत्र से सम्बन्धित कोई इच्छा रखते हैं तो इसकी पूर्ति तभी संभव हो पाती है जबकि आपकी कुण्डली के एकादश भाव में राहु मौजूद हो. आध्यात्मिक इच्छा की पूर्ति के सम्बन्ध में इस भाव में केतु की स्थिति से विचार किया जाता है. ज्योतिषाचार्यों के मतानुसार एकादश भाव में शुभ ग्रह हों अथवा पाप ग्रह दोंनों ही शुभ फल प्रदान करते हैं। एकादश भाव पर ग्रहों की दृष्टि भी इच्छा पूर्ति के संदर्भ में प्रभाव डालती हैं। इस भाव पर बृहस्पति एवं चन्द्र (Aspects of Jupiter and Moon) की दृष्टि शीघ्र एवं निश्चित फल देने वाली कही जाती है। इस भाव में कोई भी ग्रह तभी इच्छा पूर्ति में बाधा उत्पन्न करते हैं जबकि वे नीच राशि में हों अथवा एकादशेश नीच राशि में हों या अस्त हों। 


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प्रश्न कुण्डली में पंचम भाव(Fifth house in Prashana kundli)

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जिस तरह संगीत में पंचम सुर को सबसे मीठा कहा गया है उसी प्रकार ज्योतिषशास्त्री कुण्डली में पंचम भाव को बहुत ही महत्वपूर्ण बताते हैं। वास्तव मे पंचम भाव(Fifth House) हमारे जीवन में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
पंचम भाव ज्ञान का भाव है, ज्ञान जिससे जीवन की दिशा निर्देशित होती है उसका स्वामी होने से इस भाव की महत्ता काफी बढ़ जाती है। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं, पंचम भाव को त्रिकोण स्थान भी कहा गया हैं(According to the Astrologer Fifth House is also called Tring House)। यह भाव बहुत ही शुभ माना गया है।पंचम भाव को बुद्धि स्थान कहा गया है। पंचम भाव से ही शिक्षा के सम्बन्ध में भी विचार किया जाता है तथा संतान के कारक भाव के रूप में भी पंचम भाव को स्थान दिया गया है(Place of Fifth House as a Significator of Birth)।
अगर आपके जीवन में अचाचनक लाभ या अचानक हानि हो रही है तो इस स्थिति का भी आंकलन पंचम भाव से किया जाता है अर्थात पंचम भाव आकस्मिक लाभ.हानि के सम्बन्ध में भी प्रभाव रखता है.इन सबके अलावा पंचम भाव इसलिए भी विशेष स्थान रखता है क्योंकि इसी भाव से प्रेम की स्थिति का आंकलन किया जाता है, ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार प्रेम सम्बन्ध के लिए पंचम भाव योगकारक होता है।(According to the Astrologer Fifth house is also useful for the Relationship of love)
आइये अब हम पंचम भाव से सम्बद्ध कुछ विषयों की विस्तार से व्याख्या कर लेते हैं.मान लीजिए आपने संतान के सम्बन्ध में प्रश्न किया, आपके प्रश्न को जानकर ज्योतिषशास्त्री प्रश्न कुण्डली बनाकर सबसे पहले लग्न स्पष्ट करते हैं(Astrologer first generate Ascendent in Prashana Kundli).लग्न स्पष्ट होने के पश्चात लग्न/लग्नेश के साथ ही पंचम भाव(Ascendent and Lord of Ascendent with Fifth House)/पंचमेश तथा संतान के कारक बृहस्पति की स्थिति का आंकलन किया जाता है.उपरोक्त भाव एवं ग्रह शुभ होकर बलवान स्थिति में हों तो आपको संतान सुख प्राप्त होता है.यदि ये भाव/ग्रह पाप पीड़ित या कमजोर स्थिति(Aflected and Debilitated planets) में हों तो सन्तान सुख में बाधा आती है।

र शिक्षा के सम्बन्ध में पंचम भाव से विचार करें तो लग्न/लग्नेश के साथ ही पंचम भाव/पंचमेश तथा शिक्षा के कारक ग्रह बुध एवं बृहस्पति(Mercury and Jupiter is the Significator of Education and Lord of Fifth House) की स्थिति से परिणाम ज्ञात होता है.उपरोक्त भाव एवं ग्रह शुभ स्थिति में होकर बलवान हों तो शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिलती है, और सम्बन्धित भाव एवं ग्रह कमजोर स्थिति में हों या पाप पीड़ित हों तो शिक्षा के सम्बन्ध में रूकावटों का सामना करना पड़ता है.इन तथ्यों के अलावा यहां यह भी गौर करने योग्य विषय है कि अन्य ग्रहों का दृष्टि या युति(Aspect and Combination of Other Planets) द्वारा कोई सम्बन्ध तो नहीं बन रहा, अगर सम्बन्ध बन रहा है तो वह ग्रह लग्न का शत्रु (Enemy Of Ascendent) है या मित्र क्योंकि अन्य ग्रह काफी हद तक परिणाम को प्रभावित करते हैं. इन दिनों शेयर बाज़र के प्रति लोगों में आकर्षण बढ़ता जा रहा है, अगर आप भी शेयर के मामलों में रूचि रखते हैं और जानना चाहते हैं कि बाज़ार में आपके शेयर की क्या स्थिति रहेगी, तो इस प्रश्न के जवाब में प्रश्नकुण्डली के सिद्धान्त के अनुसार लग्न/लग्नेश, पंचम भाव/पंचमेश तथा बृहस्पति का आंकलन किया जाता है.उपरोक्त भाव एवं ग्रह बलवान स्थिति में हों तो आपको शेयर से लाभ मिलता है, यदि सम्बन्धित भाव एवं ग्रहों की कमजोर स्थिति (Debilitated Status of house and Planets)हो तो शेयर में नुकसान की संभावना रहती है.
ज्योतिषशास्त्रियों की मानें तो प्रश्न के अनुसार भाव कारक बदल जाते हैं(Changes in Significator house according to the Prashana), इसलिए इसे सावधानी से देखा जाता है.किसी भी प्रश्न का उत्तर भाव/भावेश के साथ ही कारक ग्रह के आंकलन के बिना अधूरा रहता है.कई बार ऐसा भी होता है कि ज्योतिषशास्त्री वस्तु की अपेक्षा भाव कारक ग्रह की गणना कर लेते हैं इससे परिणाम में अंतर आ जाता है, अत: फलादेश करते समय हर छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना आवश्यक होता है

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प्रश्न कुण्डली से रोग एवं उनके उपचार (Diseases and their remedies from Prashna Kundali)

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ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो जीवन की हर छोटी बड़ी घटना ग्रहों से प्रभावित होती है.स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों एवं रोग का कारण भी ग्रह हैं.ज्योतिष की विधा प्रश्न कुण्डली रोग के विषय में क्या कहती है
मानव शरीर पंचभूतों से बना हुआ है.इन पंच भूतों पर आकाशीय ग्रहों का प्रभाव बना रहता है.ज्योतिषशास्त्र की दृष्टि से देखा जाए तो जीवन की हर छोटी बड़ी घटना ग्रहों से प्रभावित होती है.स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों एवं रोग का कारण भी ग्रह हैं.ज्योतिष की विधा प्रश्न कुण्डली रोग  (Prashna kundali on health matters). के विषय में क्या कहती है 
रोग के कारक ग्रह (Planets related to diseases)
बुखार, हृदय सम्बन्धी रोग, नेत्र रोग, सिर दर्द, अस्थियों में तकलीफ, पित्त दोष ये ऐसे रोग हैं जिनके कारक ग्रह सूर्य हैं.सर्दी - खांसी, फेफड़ों में परेशानी, नजला, जुकाम, क्षय रोग, श्वास सम्बन्धी रोग एवं मानसिक रोगों के लिए चन्द्र कारक होता है.एलर्जी, पागलपन, हिस्टीरिया, चर्म रोग, मिर्गी एवं सन्निपात के लिए बुध उत्तरदायी होता है.पीलिया, पेट की खराबी, गुर्दे में परेशानी, वायु विकार, मोटपा जैसे रोगों के लिए गुरू उत्तरदायी होते है.शुक्र के प्रभाव से गुप्त रोग, कमज़ोरी, प्रदर, मधुमेह का सामना करना होता है.जोड़ों में दर्द, नाड़ी सम्बन्धी दोष, गठिया, सूखा, पेट दर्द की तकलीफ का कारण शनि होता है.
सूर्य और मंगल के कारण बवासीर, सिर दर्द, चोट, ब्लड प्रैशर, रक्त विकार की समस्याओं का सामना करना होता है.सूर्य और बुध के प्रभाव से एलर्जी, मियादी बुखार, पीलिया, सन्निपात, क्षय रोग होता है.सूर्य और राहु के योग से कैन्सर, एनीमिया, गर्भाशय के रोग, प्रदर एवं कुष्ठ रोग का सामना करना होता है.सूर्य और शुक्र के योग से वीर्य दोष, पागलपन, गुप्त रोग का सामना करना होता है.

रोग निदान (Remedies through Prashna Kundali)
प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन होता है जबकि चन्द्रमा बलवान हो और 1, 5, 7 एवं 8 भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार से रोग का ईलाज संभव हो पाता है.पत्रिका में तृतीय, षष्टम, नवम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार के उपरान्त रोग से मुक्ति मिलती है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों और सप्तमांश बलवान हों तो रोग का निदान संभव होता है.चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह की स्थिति से ज्ञात होता है कि रोगी को दवाईयों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा.
प्रश्न कुण्डली में रोग से सम्बन्धित भाव (Houses related to diseases in Prashna Kundali)
प्रश्न ज्योतिष के अनुसार प्रश्न कुण्डली में लग्न स्थान चिकित्सक का (First house belongs to the physician), चौथा स्थान उपचार और दवाईयों का होता है.कुण्डली में छठा एवं सातवां भाव रोग का घर होता है व दशम भाव रोगी का होता है.प्रश्न कुण्डली के लग्न स्थान में शुभ ग्रह विराजमान हों अथवा इस स्थान को शुभ ग्रह देख रहे हों तो यह समझना चाहिए कि आप कुशल चिकित्सक की सलाह ले रहे हैं.चतुर्थ भाव शुभ ग्रह या शुभ ग्रहों की दृष्टि या युति है तो इस बात का संकेत समझना चाहिए कि रोग सामान्य उपचार से ठीक हो जाएगा.प्रश्न पूछे जाने के समय षष्टम एवं सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो एवं षष्ठेश और सप्तमेश निर्बल हों (If the sixth-lord and the seventh-lord is debilitated, then the ailment takes time to cure) या इनको शुभ ग्रह देख रहे हों तो मर्ज धीरे धीरे जाने का संकेत मिलता है।

प्रश्न कुण्डली से स्वास्थ्य लाभ (Health Analysis Through Prashna Kundali)

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सभी व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते है। लेकिन मानव शरीर मशीन के समान है इसलिए समय समय पर स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियां आती रहती हैं। स्वास्थ्य में जल्दी सुधार नहीं होने पर चिंता होती है।
इस चिंता को दूर करने के लिए प्रश्न कुण्डली से ज्ञात किया जा सकता है कि स्वस्थ्य लाभ कब होगा (Prashna Kundali Illness recovery analysis)

रोगी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के योग (Quick Recovery Horary Combinations)
लग्न अथवा लग्नेश से रोग मुक्ति (Judging recovery from Lagna & Lagna Lord)
लग्न में स्थित बलवान ग्रह शीघ्र स्वास्थ्य लाभ देते है (Powerful planets in Lagna give quick recovery)। यदि लग्नेश  और दशमेश मित्र हो तब भी स्वास्थ्य में जल्दी सुधार होता है। चतुर्थेश और सप्तमेश के बीच मित्रता होने से भी रोगी जल्दी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करता है (Friendship of fourth and seventh lord equates quick recovery)। लग्नेश का चन्द्र के साथ सम्बन्ध हो और चन्द्र शुभ ग्रहों के प्रभाव मे या केन्द्र मे स्थित (Moon in Kendra houses) हो तो इसे भी जल्दी स्वास्थ्य में सुधार का संकेत कह सकते हैं। इसी प्रकार शुभ ग्रहों के प्रभाव के अन्तर्गत केन्द्र मे लग्नेश और चन्द्र की स्थिति शीघ्र लाभ बताती है। इस योग मे सप्तमेश वक्री नही होना चाहिए (Lord of seventh house should not be retrograde)। सप्तमेश सूर्य या अष्टम भाव के स्वामी से प्रभावित नही होना चाहिए।


चन्द्रमा से रोग मुक्ति (Judging Recovery from Moon)
अपनी राशि अथवा उच्च राशि मे बलवान चन्द्रमा किसी शुभ ग्रह के साथ सम्बन्ध बनाये तो रोगी जल्दी रोग मुक्त होता है (Relationship of Moon with a benefic)। चन्द्र अगर चर अथवा द्विस्वभाव राशि (Moon in a Moveable or Dual sign) मे होकर लग्न या लग्नेश द्वारा दृष्ट हो (Moon aspected by Lagna/Lagna Lord) तो तब भी शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की संभावना बनती है। इसी प्रकार का परिणाम तब भी प्राप्त होता है जब चन्द्रमा अपनी राशि मे चतुर्थ अथवा दशम भाव मे स्थित होता है। शुभ ग्रहो से दृष्ट चन्द्र अथवा सूर्य एक, चार या सातवे भाव मे स्थित हो तब भी जल्दी स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

स्वास्थ्य लाभ में विलम्ब वाले योग (Astrological combinations for delayed recovery)
प्रश्न ज्योतिष के अनुसार यदि लग्नेश और दशमेश के बीच अथवा चतुर्थेश और सप्तमेश के बीच शत्रुता (Enmity between Ascendant lord and fourth lord) हो तो रोग और बढ जाता है। कुण्डली में षष्टेश से रोग को देखा जाता है। यदि किसी प्रश्न कुण्डली मे षष्ठेश अष्टमेश अथवा द्वादशेश के साथ सम्बन्ध बनाये तो स्वास्थ्य लाभ की संभावना बहुत कम होती है। लग्न मे चन्द्र अथवा शुक्र की उपस्थिति होने से जल्दी रोगमुक्त होने की संभावना नहीं बनती है (Moon or Venus in Lagna)। प्रश्न कुण्डली मे लग्नेश एवं मंगल की युति का होना भी स्वास्थ्य लाभ के संदर्भ में शुभ फलदायी नहीं होता है। द्वादश भाव मे लग्नेश स्थित हो तो रोगी देर से रोगमुक्त होता है (Lagna lord placed in 12th house)। इसी प्रकार यदि लग्नेश षष्टम, अष्टम भाव मे स्थित हो और अष्टमेश केन्द्र मे स्थित हो तो रोगी शीघ्र रोग मुक्त नहीं हो पाता है।

शरीर के अंग बारह भाव (12 Houses & Body Parts)
कुण्डली मे बारह भाव शरीर के विभिन्न अंगो को बताते है। सभी भाव रोग के किसी न किसी स्थान को सूचित करते है जैसे-


  • प्रथम भाव : सिर , मस्तिष्क , स्नायु तंत्र .
  • द्वितीय भाव: चेहरा, गला, कंठ, गर्दन, आंख.
  • तीसरा  भाव : कधे, छाती , फेफडे, श्वास , नसे , और बाहें.
  • चतुर्थ भाव : स्तन, ऊपरी आन्त्र क्षेत्र, ऊपरी पाचन तंत्र
  • पंचम भाव : हृदय, रक्त, पीठ, रक्तसंचार तंत्र.
  • षष्ठम भाव : निम्न उदर, निम्न पाचन तंत्र, आतें, अंतडियाँ, कमर, यक्रत.
  • सप्तम भाव : उदरीय गुहिका, गुर्दे.
  • अष्टम भाव : गुप्त अंग, स्त्रावी तंत्र , अंतडियां, मलाशय, मूत्राशय और मेरुदण्ड .
  • नवम भाव : जॉघें, नितम्ब और धमनी तंत्र.
  • दशम भाव : घुटने, हडियां और जोड़.
  • एकादश भाव : टागे, टखने और श्वास.
  • द्वादश भाव : पैर, लसीका तंत्र और आंखे.
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प्रश्न कुण्डली से विवाह विचार (Marriage Analysis From The Horary Chart)

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सोलह संस्कारों में विवाह को सर्वप्रमुख माना जाता है. विवाह के माध्यम से स्त्री और पुरूष का सम्बन्ध बनता है. यह सम्बन्ध दिखने में भले ही लौकिक लगता है लेकिन किसकी जोड़ी किससे बनेगी वह ईश्वर तय करता है. आपके लिए ईश्वर ने क्य तय कर रखा है जानना चाहेंगे, तो देखिये प्रश्न कुण्डली.
शीघ्र विवाह के योग (Combinations for quick Marriage)
प्रश्न कुण्डली मे यदि शनि सम भाव मे हो तो वह वधू प्रदान करता है (Saturn in neutral house). इसी प्रकार जब चन्द्र सप्तम भाव या द्वितिय भाव मे हो अथवा तृतीय, छठे, दशम अथवा एकादश भाव मे हो और गुरु उसे देख रहा हो तो  शीघ्र विवाह का योग बनता है. इसी प्रकार का परिणाम तब भी मिलता है जब तृतीय, पंचम अथवा एकादश भाव में स्थित चन्द्रमा को गुरू देखता है (Moon aspecting Jupiter while placed in 1st, 5th, 11).

सप्तम भाव मे लग्नेश अथवा चन्द्र हो या लग्न मे सप्तमेश हो तो विवाह शीघ्र होता है. सप्तमेश मे साथ लग्नेश और चन्द्र सम्बन्ध बनाये (Seventh lord and moon combination) तो शादी जल्दी होती है. शुभ भावों मे शुक्र अथवा चन्द्र उच्च हो तो तब भी जल्दी विवाह होने की संभावना बनती है.

विवाह के पश्चात समृद्धि (Post Marriage Prosperity)
प्रश्न कुण्डली के अनुसार अगर कुण्डली में सप्तमेश और शुक्र उपचय भावो अर्थात तृतीय, षष्ट, दशम अथवा एकादश भाव में हो तो यह योग विवाह के पश्चात दाम्पत्य जीवन में समृद्धि और खुशहाली लाता है.
इसके अलावा सप्तमेश और शुक्र के साथ अगर लग्नेश, चन्द्रमा या द्वितीयेश हो (Venus with Asc Lord, Moon or 2nd Lord) तब भी वैवाहिक जीवन में समृद्धि का आगमन होता है.

प्रश्न कुण्डली में प्रेम विवाह के योग (Love Marriage and Horary astrology)
प्रेम विवाह भी विवाह की एक पद्धति है जिसका भारतीय शास्त्रों में उल्लेख किया गया है. प्रश्न कुण्डली के अनुसार इस प्रकार के विवाह का योग तब बनता है जब कुण्डली में तृतीय, छठे, सातवें, दसवें या ग्यारहवें भावो मे चन्द्रमा शुभ राशि मे स्थित हो और बुध, सूर्य अथवा गुरु उसे देखता हो.
प्रेम विवाह के संदर्भ में लग्नेश और द्वादशेश तथा लग्नेश और सप्तमेश में परिवर्तन योग में महत्वपूर्ण होता है. इस योग की स्थिति में प्रेम विवाह होने की संभावना बनती है. प्रश्न कुण्डली में शुक्र और चन्द्र का अपनी उच्च राशि अथवा स्वराशि (Moon/Venus in own sign/exalted) में होना प्रेम विवाह की संभावना को मजबूत बनाता है. अगर पंचमेश सप्तमेश अथवा लग्नेश के साथ युति या दृष्टि समबन्ध बनाता हो तो व्यक्ति को मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त होता है.

विवाह में विलम्ब के योग (Delays in Marriage)
यदि अष्टमेश पाप ग्रह होकर लग्न अथवा सप्तम भाव को प्रभावित करे (Malefic eighth lord aspecting Ascendant) तो विवाह मे देरी की सम्भावना होती है.
कुण्डली के अष्टम भाव में अगर कोई क्रूर ग्रह स्थित हो तब भी विवाह में विलम्ब की संभावना बनती है.