Saturday, 9 March 2013

भोले की भक्ति का पर्व : महाशिवरात्रि

                 भोले की भक्ति का पर्व : महाशिवरात्रि  



भारत पर्वों का देश है यह तो हम सब जानते हैं और यह पर्व ज्यादातर हमारी भक्ति और ईश्वर की स्तुति पर निर्भर होते हैं. मार्च माह शुरु हो चुका है और इस माह कई ऐसे त्यौहार आने को हैं जिनका हमें बेसब्री से इंतजार रहता है. महाशिवरात्रि भी इनमें से एक है. भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला यह त्यौहार हमारी संस्कृति का एक अहम अंग है. 



shiva_hmमहाशिवरात्री की कथा :  फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है. माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतरण हुआ था. प्रलय की वेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं. इसीलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा गया. तीनों भुवनों की अपार सुंदरी तथा शीलवती गौरा को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं. उनका रूप बड़ा अजीब है. शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है.  



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भोला है शिव: शिव को जहां एक ओर प्रलय का कारक माना जाता है वहीं शिव को भोला भी कहा जाता है. मात्र बेल और भांग के प्रसाद से प्रसन्न होने वाले भगवान शिव की आज के दिन पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व और विधान है. प्राचीन कथा के अनुसार आज के दिन ही शिव और पार्वती का विवाह हुआ था. नर, मुनि और असुरों के साथ बारात लेकर शिव माता पार्वती से विवाह के लिए गए थे. शिव की नजर में अच्छे और बुरे दोनों ही तरह के लोगों का समान स्थान है. वह उनसे भी प्रेम करते हैं जिन्हें यह समाज ठुकरा देता है. शिवरात्रि को भगवान शिव पर जो बेल और भांग चढ़ाई जाती है यह शिव की एकसम भावना को ही प्रदर्शित करती है. शिव का यह संदेश है कि मैं उनके साथ भी हूं जो सभ्य समाजों द्वारा त्याग दिए जाते हैं. जो मुझे समर्पित हो जाता है, मैं उसका हो जाता हूं.   




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शिव की महिमा: शिव सबसे क्रोधी होने के साथ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले भी हैं. इसीलिए युवतियां अपने अच्छे पति के लिए शिवजी का सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं. हिंदू मान्यता के अनुसार शिव जी की चाह में माता पार्वती ने भी शिव का ही ध्यान रखकर व्रत रखा था और उन्हें शिव वर के रुप में प्राप्त हुए थे. इसी के आधार पर आज भी स्त्रियां अच्छे पति की चाह में शिव का व्रत रखती है और शिवरात्रि को तो व्रत रखने का और भी महत्व और प्रभाव होता है.





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शिव की आराधना करने वाले उन्हें प्रसन्न करने के लिए भांग और धतूरा चढ़ाते हैं. इस दिन मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर ‘शिवलिंग’ पर चढ़ाया जाता है. अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर उसे पूजने का विधान है. इसके साथ ही रात्रि के समय शिव पुराण सुनना चाहिए.


जैसा कि हमेशा ही कहा जाता है शिव भोले हैं और साथ ही प्रलयकारी भी तो अगर आप भी अपने सामर्थ्य के अनुसार ही शिव का व्रत रखते हैं तो आपकी छोटी सी कोशिश से ही भगवान शिव अतिप्रसन्न हो सकते हैं. 


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महाकालेश्वर की पौराणिक गाथा - स्मृति जोशी

'अनेकानेक प्राचीन वांग्मय महाकाल की व्यापक महिमा से आपूरित हैं क्योंकि वे कालखंड, काल सीमा, काल-विभाजन आदि के प्रथम उपदेशक व अधिष्ठाता हैं।

अवन्तिकायां विहितावतारं
मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम्‌
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं
वन्दे महाकाल महासुरेशम॥

'अर्थात जिन्होंने अवन्तिका नगरी (उज्जैन) में संतजनों को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवतार धारण किया है, अकाल मृत्यु से बचने हेतु मैं उन 'महाकाल' नाम से सुप्रतिष्ठित भगवान आशुतोष शंकर की आराधना, अर्चना, उपासना, वंदना करता हूँ।

इस दिव्य पवित्र मंत्र से निःसृत अर्थध्वनि भगवान शिव के सहस्र रूपों में सर्वाधिक तेजस्वी, जागृत एवं ज्योतिर्मय स्वरूप सुपूजित श्री महाकालेश्वर की असीम, अपार महत्ता को दर्शाती है। 





शिव पुराण की 'कोटि-रुद्र संहिता' के सोलहवें अध्याय में तृतीय ज्योतिर्लिंग भगवान महाकाल के संबंध में सूतजी द्वारा जिस कथा को वर्णित किया गया है, उसके अनुसार अवंती नगरी में एक वेद कर्मरत ब्राह्मण हुआ करता था। वह ब्राह्मण पार्थिव शिवलिंग निर्मित कर उनका प्रतिदिन पूजन किया करता था। उन दिनों रत्नमाल पर्वत पर दूषण नामक राक्षस ने ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर समस्त तीर्थस्थलों पर धार्मिक कर्मों को बाधित करना आरंभ कर दिया।

वह अवंती नगरी में भी आया और सभी ब्राह्मणों को धर्म-कर्म छोड़ देने के लिए कहा किन्तु किसी ने उसकी आज्ञा नहीं मानी। फलस्वरूप उसने अपनी दुष्ट सेना सहित पावन ब्रह्मतेजोमयी अवंतिका में उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया। जन-साधारण त्राहि-त्राहि करने लगे और उन्होंने अपने आराध्य भगवान शंकर की शरण में जाकर प्रार्थना, स्तुति शुरू कर दी। तब जहाँ वह सात्विक ब्राह्मण पार्थिव शिव की अर्चना किया करता था, उस स्थान पर एक विशाल गड्ढा हो गया और भगवान शिव अपने विराट स्वरूप में उसमें से प्रकट हुए।

विकट रूप धारी भगवान शंकर ने भक्तजनों को आश्वस्त किया और गगनभेदी हुंकार भरी, 'मैं दुष्टों का संहारक महाकाल हूँ...' और ऐसा कहकर उन्होंने दूषण व उसकी हिंसक सेना को भस्म कर दिया। तत्पश्चात उन्होंने अपने श्रद्धालुओं से वरदान माँगने को कहा। अवंतिकावासियों ने प्रार्थना की- 



'महाकाल, महादेव! दुष्ट दंड कर प्रभो
मुक्ति प्रयच्छ नः शम्भो संसाराम्बुधितः शिव॥
अत्रैव्‌ लोक रक्षार्थं स्थातव्यं हि त्वया शिव
स्वदर्श कान्‌ नरांछम्भो तारय त्वं सदा प्रभो॥

अर्थात हे महाकाल, महादेव, दुष्टों को दंडित करने वाले प्रभु! आप हमें संसार रूपी सागर से मुक्ति प्रदान कीजिए, जनकल्याण एवं जनरक्षा हेतु इसी स्थान पर निवास कीजिए एवं अपने (इस स्वयं स्थापित स्वरूप के) दर्शन करने वाले मनुष्यों को अक्षय पुण्य प्रदान कर उनका उद्धार कीजिए।

इस प्रार्थना से अभिभूत होकर भगवान महाकाल स्थिर रूप से वहीं विराजित हो गए और समूची अवंतिका नगरी शिवमय हो गई।

महाशिवरात्रि की पवित्र प्रामाणिक कथा

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।

शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।

बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुँची।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। 


कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। 


तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मारो। शिकारी हँसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा। 


मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।

अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

शिवकथा का संदेश
शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पण्डित एवं पूजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एव दूध, दही, एवं बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं। इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।

वास्तव में वह शिकारी शिव पूजन नहीं कर रहा था। इसका अर्थ यह भी हुआ कि वह किसी तरह के किसी फल की कामना भी नहीं कर रहा था। उसने मृग परिवार को समय एवं जीवन दान दिया जो कि शिव पूजन के समान है। शिव का अर्थ ही कल्याण होता है। उन निरीह प्राणियों का कल्याण करने के कारण ही वह शिव तत्व को जान पाया तथा उसका शिव से साक्षात्कार हुआ।

परोपकार करने के लिए महाशिवरात्रि का दिवस होना भी आवश्यक नहीं है। पुराण में चार प्रकार के शिवरात्रि पूजन का वर्णन है।मासिक शिवरात्रि, प्रथम आदि शिवरात्रि, तथा महाशिवरात्रि। पुराण वर्णित अंतिम शिवरात्रि है-नित्य शिवरात्रि। वस्तुत: प्रत्येक रात्रि ही 'शिवरात्रि' है अगर हम उन परम कल्याणकारी आशुतोष भगवान में स्वयं को लीन कर दें तथा कल्याण मार्ग का अनुसरण करें, वही शिवरात्रि का सच्चा व्रत है। 

Friday, 8 March 2013

महाशिवरात्रि कथा...

महाशिवरात्रि कथा...




माघ महिन्यातील अत्यंत महत्वाचा व पवित्र दिवस म्हणजे महाशिवरात्र, ही माघ महिन्यात वद्य चतुर्दशीला येते याबाबत एक कथा प्रचलीत आहे. 

विंध्य पर्वताच्या घनदाट अरण्यात एक शिकारी राहत होता तो शिकार करून आपल्या बायको मुलांचे पालन पोषण करीत असे. एके दिवशी हरणांची शिकार करण्यासाठी व्याध एका झाडावर लपून बसला होता. झाडांच्या पानंमुळे काही दिसत नव्हते म्हणून तो एक एक पान तोडून खाली टाकू लागला आणि योगायोग असा की त्या झाडाखाली शिवाचे मंदिर होते व ते झाड बेलाचे होते.रात्री एक हरिणी पाणी पिण्यासाठी तिथे आली व्याधाला तिची चाहूल लागली.

व्याध बाण सोडणार तितक्यात त्या हरिणीचे लक्ष त्या शिकाऱ्याकडे गेले व ती त्याला म्हणाली अरे व्याधा जरा थांब! मला मारू नकोस कारण माझी पाडसे घरी वाट पाहत असतील त्यांची भेट घेऊन येते मग मार. त्या शिकाऱ्याने तिचे म्हणणे कबूल केले. व्याधाला दया आली त्याने तो विचार सोडून दिला. त्या दिवशी व्याधा कडून शिवाला बेलाच्या पानांचा अभिषेक झाला होता, शिकार न मिळाल्यामुळे उपवास घडला होता. यामुळे त्याने दाखविलेल्या दयेमुळे भगवान शंकर प्रसन्न झाले व व्याधाला हरिणीला बछड्यासह त्यांनी स्वर्गात स्थान दिले म्हणून हा दिवस महाशिवरात्र म्हणून मानण्यात येऊ लागला.

आजही तो व्याध आणि कळपांच्या म्होरक्या मृग हे नक्षत्राच्या रूपाने आकाशात रात्री चमकताना दिसतात.

Thursday, 28 February 2013

॥ श्री महालक्ष्मी माहात्म्य ॥

                            ॥ श्री महालक्ष्मी माहात्म्य ॥ 



नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥१॥
नमस्त् गरुडारुढे कोलासुर भयंकरि । कुमारि वैष्णवि ब्राह्मि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥२॥
प्रथम वंदितो श्रीगजाननाशी । जो नाशी विघ्नराशी । सद्भावे त्याच्या चरणांशी । कृपा भाकितो । ग्रंथ सिद्ध्यर्थ ॥१॥
कार्यारंभी गणेशाचे पूजन स्मरण । विघ्नांचे हो‌ई हरण । आणि कार्यसिद्धी जाण । होत असे निश्चये ॥२॥
माझिये अंतरी वसावे । सर्वकाळ वास्तव्य करावे । मज वाकशून्यास वदवावे । कृपाकटाक्षे ॥३॥
आता नमन माझे श्रीशारदेशी । जी सर्व विद्यांची स्वामिनी । ब्रह्मादिकांची जननी । प्रणवरूपिणी जगन्माता ॥४॥
व्यास वाल्मिक तुकाराम । ज्ञानेश्वर भगवंताचे अवतर । ज्यांचे अवतार कार्य थोर । त्यांसि नमितो अत्यादरे ॥५॥
स्वामी समर्थ दत्तावतार । भक्तकार्यार्थ झाला भूवर । त्यांचे स्मरण करता वरचेवर । भक्तोद्धार होतसे ॥६॥
माझे साष्टांग नमन त्यांचे चरणी । कृपा करोनी चालावी लेखणी । ऐशी करितो विनवणी । लक्ष्मी माहात्म्य वर्णावया ॥७॥ 

आता महात्म्य वर्णावयास । शरण तिच्या चरणास । वंदितो स्फूर्ति देण्यास । माहात्म्य गावे म्हणून ॥८॥
जय जय जगज्जननी । तू भवभयहरिणी । भक्तांसी संकट तारिणी । तुज वंदितो मनोभावे ॥९॥ अनेक अवतार धरून । तू केलेस भक्त पालन । आणि दुष्टांचे संहरण । म्हणून सुखनिधान आम्हासी ॥१०॥
तू सकळ जगाची माता । चराचरावर तुझी सत्ता । भक्तांवरी माया सर्वथा । आम्हालागी प्रसन्न हो ॥११॥
तू अनंत । तुझी नामे अनंत । त्यातून आठवून काही एक । प्रार्थना तुजसी करतसे ॥१२॥
लक्ष्मी लज्जे महाविद्ये । श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे । महारात्री महामाये । नारायणि नमोस्तुते ॥१३॥
मेधे सरस्वती वरे । भूति बाभ्रवि तामसी । नियते त्वं प्रसीदेशे । नारायणि नमोस्तुते ॥१४॥
पूर्वी मार्कण्डेय मुनींनी । शिष्यांस जी कथन केली । सुतांनी शौनकास कथिली । तीच अनुवादिली कथा येथं ॥१५॥
महालक्ष्मीचे महात्म्य । पुण्यफलद प्दमपुराणात वर्णन । केले आहे आवर्जुन । सारांश त्याचा हा असे ॥१६॥
पूर्वी द्वापारयुगा माझारी । पवित्र सौराष्ट्र भूमिवरी । जे कथा घडली अवनीवरी । तीच आता श्रवण करी ॥१७॥
त्या सौराष्ट्र राज्यावरी । राजा भद्रश्रवा राज्य करी । शूर वीर कीर्तिमंत । समुद्र स्वामी तो होता ॥१८॥
त्यासी वेदांचे ज्ञान होते । प्रजाहितात लक्ष होते । संत ब्राह्मण संतोषते । केले त्याने ॥१९॥
त्याची पत्नी सुरतचंद्रिका । लाखात सुलक्षणी हो का । अष्टपुत्रा पतिव्रता वैभवी नांदतसे ॥२०॥
राणीस होते पुत्र सात । वरी कन्या एक । शामबाला नामक । अत्यंत भाविक ती ॥२१॥
एकदा काय झाले । महालक्ष्मीच्या मनात आले । तिच्या राज्यात जावे । आठवण आहे का पहावे । पूर्वजन्मीची ॥२२॥
राजवैभव वाढवावे । प्रजेत ते पोहोचवावे । म्हणून राजास द्यावे । कृपादान ॥२३॥
गरिबावर करितां कृपा । तोच खा‌ईल एकटा । इतरेजनांस वाटा । कैसा मिळे ॥२४॥
म्हणोनि लक्ष्मीने काय केले । आपले रूप पालटले । म्हातारीचे रूप घेतले । चाले काठी टेकित ॥२५॥
दीनपणे राजद्वारी पोचली । तोच एक दासी आली । कोणास भेटाण्या आली । विचारी तीस ॥२६॥
काय तुझे नाव आहे । कोण तुझे पती असती । कोण्या गावे करिसी वसती । काम काय आहे ॥२७॥ 

वृद्धा म्हणे माझे नाव कमला । भुवनेश पति मजला । द्वारकेत असते वस्तीला । राणीस भेटणे असे ॥२८॥
तुझ्या राणीस ओळखते । लक्ष्मीकृपे वैभव भोगते । काय लक्ष्मीस स्मरते । पहाण्यास आले मी ॥२९॥
राणी रमली महालात । मैत्रिणीच्या समवेत । आपुल्या निरोपे ये‌ईल क्रोधात । जाय परतोनी म्हणे दासी ॥३०॥
वृद्धा म्हणे दासीला । ऐक तिच्या पूर्ववृत्ता । दारिद्र्य जावोनी ऐश्वर्यमत्ता । कैशी आली ॥३१॥
राणीला गर्व झाला दिसे । श्रीमंतीने लाविते पिसे । गरिबा भेटण्या न दिसे । एकही पळ ॥३२॥
धुंदी चढली वैभवाची । उतरली पाहिजे साची । हीच प्रजाकल्याणाची । वाट दिसे ॥३३॥
पूर्वजन्मीचे विसरली । लक्ष्मीने कृपा केली । दारिद्रयातून वर आली । राजवैभव भोगिते ॥३४॥
पूर्वजन्मीची वैश्य पत्नी । दारिद्रये गेली गांजोनी । पतिपत्नी नित्य भांडोनी । संसारसुखा आंचवले ॥३५॥
पती मारहाण करी । नित्य संतापे भाष्य करी । पत्नी मनी विचार करी । धन जवळ करावे ॥३६॥
घर सोडोनि जाण । गेली वनात निघोन । तेथे कष्ट दशा दारूण । वणवण फिरता भोगितसे ॥३७॥
कंटक रूतती पायात । अश्रू दाटती नेत्रात । घास नसे पोटात । ब्रह्मांड आठवे ॥३८॥
बसली एका दगडावर । रूदन करी अपार । नेत्री संतत धार । अश्रूंची होती ॥३९॥
लक्ष्मी देवीस करूणा आली । तेथ्ं ती प्रगटली । धीर दे‌ऊन वदली । चिंता न करी बाळे ॥४०॥
तिला लक्ष्मीव्रत सांगितले । सुखसंपत्ति आशिर्वाद दिले । कळवळ्याने वाचविले । तिजला ॥४१॥
मार्गशीर्ष महिन्यात । प्रति गुरुवारी अखंडित । निष्ठा ठे‌ऊन मनात । व्रत अन् उद्यापन केले तिने ॥४२॥
त्या व्रताच्या प्रभावाने । लक्ष्मी मातेच्या कृपेने । वैश्यगृह विपुल धनाने । गेले भरून ॥४३॥
दैन्य दु:खे पळाली । भांडणे ती संपली । सुखे उभी राहिली । पुढे हात जोडोनी ॥४४॥
मग लक्ष्मीचे व्रताचरण । अखंड केले धारण । वर्षानुवर्षे पालन । मनोभावे करीतसे ॥४५॥
आयुर्मर्यादा संपता । ते गेले लक्ष्मीलोका । जितुके वर्षे आचरिले व्रता । तितकी सहस्त्र वर्षे सुखे । राहिले तेथे ॥४६॥ 

त्या पुण्ये पुढले जन्मी । वैश्यपत्नी झाली राणि । वैभव विलास भोगुनि । अहंकार प्रवर्तला ॥४७॥
उतली आणि मातली । घेतला वसा विसरली । आठवण देण्यास तिला भली । येणे हे जाहले असे ॥४८॥
असो कर्म गती गहन । तिला व्रताचे विस्मरण । बोलण्यास तिला नाही क्षण । मी जाते ॥४९॥
दासी म्हणे आजीबा‌ई थांबा । मलाही लक्ष्मीव्रत सांगा । मी ही करेन मले सांगा । दारिद्रय दु:खे पिडले मी ॥५०॥
उतशील आणि मातशील । घेतला वसा टाकशील । धनसंपदा येता वर्तशील । अहंकारे ॥५१॥
तसे होणार नाही । शब्दाला जागेन मी । श्रद्धापूर्वक नमते मी । माते कथी आता ॥५२॥
लक्ष्मी वृद्धारूप नारी । वचने प्रसन्न दासीवरी । व्रताची महती सारी । कथन करी संक्षेपे ॥५३॥
मासा माजी मार्गशीर्ष । त्यास असे ईश्वरी अंश । सुयोग्य लक्ष्मी व्रतास । श्रेष्ठ सर्वि मानला ॥५४॥
मार्गशीर्षी प्रथम गुरूवार । आरंभ करावे व्रत हे थोर । प्रत्येक गुरूवारी महिनाभर । नेमे पूजा करावी ॥५५॥
पहाटे करावे स्नान । निर्मळ असावे तनमन । जागा गोमये सारवून । पाट वा चौरंग मांडावा ॥५६॥
फरशी असता नको सारवण । घ्यावे फडक्याने पुसुन । मग चौरंग ठे‌ऊन । त्यावरी धान्यराशी ठेवावी ॥५७॥
गहू अथवा तांदूळ । रास असावे वर्तुळ । त्यावर ठेवावा कलश । आत जल असावे ॥५८॥
त्यामाजी पैसा सुपारी । दूर्वा तैशा त्यात घाली । हळदकुंकू बोटे ओढावी । आठदिशांनी कलशावर ॥५९॥
पंचवृक्षाचे डहाळे घ्यावे । सर्व बाजूंनी कलशात रचावे । रंगवल्लीने करावे । सुशोभन ॥६०॥
चौरंगावरी देठाची दोन पाने । त्यावर सुपारी नि नाणे । शेजारी मूठभर तांदूळदाणे । त्यावर सुपारी गणपती । स्थापावा ॥६१॥ 

देवीचे चित्र साजिरे । कलशाजवळ ठेवावे । तैसेच लक्ष्मीयंत्रहि असावे । त्याजवळी ॥६२॥
धातूची मूर्ति असल्यावर । चित्राची नाही जरुर । पूजेस आता सत्वर । लागावे ।६३॥
सम‌ई नीरांजन उदबत्ती । प्रज्वलित करावी । वडील माणसे नमस्कारावी । पूजेपूर्वी ॥६४॥
प्रथम आचमन करावे । विड्यावर पाणी सोडावे । श्रीगणपतीस पूजावे । निर्विघ्नतेसाठी ॥६५॥
मग फुले तुळशी घे‌ऊन । त्याने जलसिंचन करून । लक्ष्मीदेवी पूजावी ॥६६॥
मूर्ति असल्या पूजेत । स्नान घालावे ताम्हनात । मग पुसोनि त्वरित । चौरंगावरी ठेवावी ॥६७॥
हळदकुंकु आदि वाहून । सुगंधी पुष्पे अर्पून । धूप नीरांजन ओवाळून । फलनैवेद्य दाखवावा ॥६८॥
सकर्पूर तांबूल अर्पावा । मनींच्या इच्छा पुरविण्यास । देवीस विनवावे ॥६९॥
बसोनि पाटावर सत्वर । व्रतकथा वाचावी सुम्दर । त्यावर माहात्म्य पोथी मनोहर । दूध फळे नैवेद्य अर्पावा ॥७०॥
मग वाचावे महालक्ष्म्यष्टक । सर्वसिद्धीदायक । पूर्णपणे वरदायक । भक्तांसी ॥७१॥
मग नीरांजन उजळावे । उदबत्ती कर्पूर लावावे । आरतीसी करावे । मनोभावे ॥७२॥
आरती झाल्यावरी । मनोभावे प्रार्थना करावी । माते मान्य करी । यथाशक्ति पूजा ही ॥७३॥
काही चूक असल्यास । माते घे‌ई पदरात । निष्ठाभाव आहे मनात । हे जाणुनि ॥७४॥
आमुचे घरी अखंड रहावे । दारिद्रय दु:ख निवारावे । संततिसंपत्तीने भरावे । घर आमुचे ॥७५॥
सुखशांती असावी । तुझे नामी मती रहावी । चित्ती कृतज्ञता रहावी । सदोदित ॥७६॥
मनोभावे करिता प्रार्थना । आ‌ईस येते करूणा । ठेवावे मनी वचना । आणि प्रार्थावे ॥७७॥
दिवसा उपवास करावा । दुग्ध फलाहार घ्यावा । रात्री मिष्टान्न नैवेद्य दाखवावा । आरतीचे वेळी ॥७८॥
गोग्रास नैवेद्य काढावा । तो गा‌ईस घालावा । आपुल्या सो‌ईने ॥७९॥
सुवासिनी ब्राह्मण । उद्यापनी भोजन । दक्षिणा दून । संतुष्ट करावे ॥८०॥
त्यानंतर आपण । घे‌ऊन प्रसादाचे पान । करावे प्रसाद भोजन । नामपूर्वक ॥८१॥

दुसरे दिवशी स्नानोत्तर । घे‌ऊनि दूध साखर । नैवेद्यानंतर । पूजा विसर्जन करावि ॥८२॥
कलशातील जल सर्व । तुळशीत करावे विसर्जन । पाच पर्णफांद्या । घे‌ऊन निघावे ॥८३॥
त्या ठेवाव्या पाच ठिकाणी । आणि यावे पूजास्थानी । हळदकुंकू अक्षता दोनदा वाहुनी । नमस्कार करावा ॥८४॥
मार्गशीर्षातील सर्व गुरूवारी । पूजन ऐसे करी । शेवटच्या गुरूवारी । उद्यापन करावे ॥८५॥
उद्यापनाचे दिवशी । पूजा आरती करोनी । सात कुमारी अथवा सुवासिनी । ह्यांसी पाचारावे ॥८६॥
त्यांना आसन द्यावे । हळदकुंकू लावावे । महालक्ष्मी म्हणोनि नमस्कारावे । एकेक फळ नि हे माहात्म्य दे‌ऊनि ॥८७॥
वृद्धा एवढे बोलून । वेगे निघाली जाण । दासी म्हणे आ‌ई एक क्षण थांब । निरोप देते राणीस ॥८८॥
निरोप मिळता राणीला । क्रोध अनिवार झाला । ये‌ऊन म्हणे तू कोण थेरडे । आली कशास इकडे ॥८९॥
वृद्धा म्हणे माजलीस । उन्मत्तपणे वागलीस । पूर्वस्थिती आठव ॥९०॥
आजच्या शुभदिनी । करुन एका स्त्रीची हेटाळणी । विपत्ति घेतलीस ओढवूनि । भोगावे लागेल ॥९१॥
शापवाणी ऐकून । राणी गेली संतापून । आणि धक़्काबुक़्की करून । वृद्धेस तिने अवमानिले ॥९२॥
महालक्ष्मी वेगे निघाली जाण । शामबाला तो समोरून । येती झाली जाण । दैव भले म्हणून ॥९३॥
ती गेली होती उद्यानात । मैत्रिणींच्या समवेत । त्याच वेळी राजमहालात । घटना ही घडली असे ॥९४॥
शामबालेने वंदन करून । आपली दिली ओळख करून । मग वृद्धेने घडले वर्तमान । कथन केले तिजसी ॥९५॥
शामबाला दु:खी झाली । तिने विनये क्षमा याचिली । कारूण्ये माय हेलावली । म्हणे तुझे कल्याण हो‌ईल ॥९६॥
सुखसंपन्नता यावी । वैभव कीर्ति लाभावी । विनयशील संतती व्हावी । म्हणून त्वां व्रत हे करावे ॥९७॥
महालक्ष्मीने तिजसी । सांगितले ह्या व्रतासी । आणि म्हटले सुखशांति । कुटुंबी नांदेल ॥९८॥
संकल्प सिद्धिस जातील । समृद्धी भाग्य येतील । पद्मावतीच्या कृपेने जाण । संपूर्ण कल्याण हो‌ईल ॥९९॥
मार्गशीर्ष महिन्यातला । तोच होता गुरूवार पहिला । शामबाला करून उपवासाला । पूजन करीत त्या दिनी ॥१००॥
शेवटचे गुरूवारी । ती उद्यापन करी । प्रसन्न झाली महालक्ष्मी । तिजवरी ॥१०१॥ 

इच्छा मनातली सारी । पूर्ण झाली लवकरी । लक्ष्मी प्रभावास नाही सरी । हेच खरे ॥१०२॥
कीर्तिमंत राजा सिद्धेश्वर । त्याचा सुपूत्र मालाधर । शामबालेस अनुरूप वर । विवाह मंगल जाहला ॥१०३॥
लक्ष्मीचा वरदहस्त लाभला । राजैश्वर्यात शामबाला । परि न सोडले नम्रतेला । भाग्यवान खरीच ती ॥१०४॥
महालक्ष्मीच्या अवकृपेने । भद्रश्रवाचे राज्य गेले । ऐश्वर्य सारे नष्ट झाले । दारिद्री झाले गोघेही ॥१०५॥
आधी दशा । मग अवदशी । नंतर अन्नानदशा । झाली त्यांचि ॥१०६॥
सुरतचंद्रिका मग पतीस । म्हणे जा‌ऊन भेटावे शामबालेस । सांगावे आपुला दुर्दशेस । समजावूनी ॥१०७॥
जाव‌ई आपुला धनवान । राखाया आपुला मान । धनसहाय्य दे‌ईल महान । संकट टळण्या ॥१०८॥
भद्रश्रवा जरी स्वाभिमानी । तरी परिस्थिती जाणॊनी । जावयाचे राज्यालगोनी । प्रयाण करिता जाहला ॥१०९॥
तळ्याकाठीं राजा बसला । तो होता थकलेला । विश्रांतिसाठी टेकला । तो दासी आल्या काही पाणी नेण्यास ॥११०॥
राजाकडे दृष्टी गेली । विनये चौकशी केली । राजाची ओळख पटली । भेटण्यास स्वारी आली । शामबालेस ॥१११॥
दासी गेली लगबगीने । शामबालेस कथन केले । पिताश्रीचे आगमन झाले । आपुल्या राज्यात ॥११२॥
अत्यादरे वडीलांस । शामबालेने राजमहालास । आणून गौरविले । वस्त्रालंकारे ॥११३॥
अल्पकाळ तेथे राहून । आपली व्यथा कथन करून । तिचे वैभव पाहून । राजा म्हणे निघतो आता ॥११४॥
राजा निघता तेथून । मालाधरे दिला भरून । हंडा सुवर्ण मोहरांनी ॥११५॥
संगे दिले नोकर । मग राजा निघाला सत्वर । चंद्रिकेस भेण्या अधिर । वेगे चाले ॥११६॥ पाहता राणिने राजास । हर्ष झाला मनास । हंडा पाहता उल्हास । मनी दाटे ॥११७॥
राजाने भेट कथन करून । हंडा दाविला उघडून । कौतुके पाहे डोकावून । तो आत काळे कोळसे ॥११८॥
राजा राणी भांबावली । काय लिहिले आहे कपाळी । भद्रश्रवा अश्रू ढाळी । दु:ख नावरे दोघांना ॥११९॥
मुलीविषयी अढी मनात । परंतु जाणे तिच्या राज्यात । मदतीचा मिळेल हात । आशा मोठी ॥१२०॥
म्हणून दु:ख आवरून । राणीने केले गमन । आली तिच्या राज्यालागून । लेकीस भेटावया ॥१२१॥
आली नदीतीरास । पाय उचलेना पुढे जाण्यास । मिटुनी आपल्या नेत्रास बसती झाली ॥१२२॥
एका दासीने देखिले । शामबालेस कथन केले । मातेने थकुनि नेत्र मिटले । बैसलीसे नदीतीरी ॥१२३॥ 

सत्वरि निघाली घे‌ऊनी रथ । वेगे चाले वाटे लांब पथ । सत्वर उतरून तेथ । वंदिले मातेस ॥१२४॥
बसवून रथात । आणीली राजमहालात । स्नान घालून त्वरित । वस्त्रालंकार दिधले ॥१२५॥
तो होता प्रथम गुरूवार । मार्गशीर्ष महिना खरोखर । मनोभावे मनोहर । पूजा करी शामबाला ॥१२६॥
शामबाला मस्तक लववी । अति‌आदरे वंदन करीं । पूर्वजन्मस्थिती जागी करी । सुरतचंद्रिकेस ॥१२७॥
माथा लववी परोपरी । लक्ष्मीव्रत पुन्हा आचरी । राहून लेकीचे घरी । करी उद्यापन ॥१२८॥
लक्ष्मी होता पुन्हा प्रसन्न । स्थिती पालटे परिपूर्ण । आनंदे फुलले मन । लक्ष्मीकृपेने ॥१२९॥
मालाधरास बुद्धि झाली । भद्रश्रवास बोलवावयास भली । तो येताच मसलत शिजली । जिंकणे राज्य पुनरपि ॥१३०॥
मग झाले भीषण । शत्रुसंगे रणकंदन । मग भद्रश्रवास सिंहासन । पुनश्च प्राप्त होय ॥१३१॥
राजधर्म पाळुनि नेटका । भद्रश्रवा जपे प्रजाहिता । प्रजा गौरवे राजसत्ता । दुवा देती ॥१३२॥
राजाचे पुत्रहि सात । परागंदा होते अज्ञात । ते सर्व परत राज्यात । आले लक्ष्मीकृपे ॥१३३॥
शामबालाही भेटण्या आली । राजाराणी मनी धाली । आनंदे ॥१३४॥
परी राणीच्या मनात । किल्मिष एक सलत । हिने संकट कालात । कोळसे दिले ॥१३५॥
म्हणुन राणी नच संभाषी । तरी शामबाला संतोषी । राहिली अल्पमुक़्कामे ॥१३६॥
मग निघता घरी । तोच हंडा मिठाने भरी । घे‌ऊन गेली घरी । आपुल्या समवेत ॥१३७॥
घरी पोहोचल्यावर । प्रश्न करी मालाधर । माहेर-भेट आणली काय् । दाखवी ॥१३८॥
राजसा थांबा थोदे तरी । मग दाखविते सत्वरी । राज्याचे सार खरोखरी । आणले आहे ॥१३९॥
मग सांगे आचाऱ्यास । स्वयंपाक अळणी करण्यास । भोजनी घेता घासास । अन्न बेचव वाटले ॥१४०॥
शामबालेने तरा करून । सर्वा मीठ वाढले पानातून । चवदार लागले सगळे अन्न । म्हणे राज्याचे सार हे ॥१४१॥
मग पतीस म्हणे प्रेमे । मीठ सौराष्ट्राचे सोने । राज्य पित्याचे सागरासम । विशाल ॥१४२॥
अन्नास चव आणि मीठ । सेवक मिठाशी जागती नित्य । मीठ खाता इमान । जागते प्राणसंकटी ॥१४३॥
राजा डोलवी मान । म्हणे ही इमानाची खूण् । मनी जतन करी जाण । सुनिश्चये ॥१४४॥
राजाराणीस लक्ष्मी पावली । दु:स्थिती दुरावली । वैभवे पुन्हा सरसावली । व्रते लक्ष्मीच्या ॥१४५॥ 

म्हणू लक्ष्मीदेवीस । सतत स्मरावे रात्रंदिवस । दे‌ईल तीच सौख्यास । भावबळे पूजिता ॥१४६॥
हे माहात्म्य जणू कल्पतरू । इच्छित लाभेल वरू । उतरेल पलपारू । व्रत मनोभावे आचरिता ॥१४७॥
देशपांडे नामे कुळात । माधवसुत रंगनाथ । लक्ष्मी माहात्म्य वदत । लोकमङ्गल व्हावया ॥१४८॥
शके अठराशे अठरात । फाल्गुन वद्य पक्षात । लक्ष्मीमाहात्म्य समाप्तीस । रंगपंचमीस आले असे ॥१४९॥
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥१५०॥
इति श्री महालक्ष्मीव्रत माहात्म्य कथा संपूर्णम् ॥

भगवान दत्तात्रेय का परिचय

                               भगवान दत्तात्रेय का परिचय 

 


भगवान दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष माह में मनाई जाती है। दत्तात्रेय में ईश्वर और गुरु दोनों रूप समाहित हैं इसीलिए उन्हें 'परब्रह्ममूर्ति सद्गुरु'और 'श्रीगुरुदेवदत्त'भी कहा जाता हैं। उन्हें गुरु वंश का प्रथम गुरु, साथक, योगी और वैज्ञानिक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं अनुसार दत्तात्रेय ने पारद से व्योमयान उड्डयन की शक्ति का पता लगाया था और चिकित्सा शास्त्र में क्रांतिकारी अन्वेषण किया था।

हिंदू धर्म के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रचलित विचारधारा के विलय के लिए ही भगवान दत्तात्रेय ने जन्म लिया था, इसीलिए उन्हें त्रिदेव का स्वरूप भी कहा जाता है। दत्तात्रेय को शैवपंथी शिव का अवतार और वैष्णवपंथी विष्णु का अंशावतार मानते हैं। दत्तात्रेय को नाथ संप्रदाय की नवनाथ परंपरा का भी अग्रज माना है। यह भी मान्यता है कि रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक भी दत्तात्रेय थे। भगवान दत्तात्रेय से वेद और तंत्र मार्ग का विलय कर एक ही संप्रदाय निर्मित किया था।

शिक्षा और दीक्षा : भगवान दत्तात्रेय ने जीवन में कई लोगों से शिक्षा ली। दत्तात्रेय ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्यकलापों से भी शिक्षा ग्रहण की। दत्तात्रेयजी कहते हैं कि जिससे जितना-जितना गुण मिला है उनको उन गुणों को प्रदाता मानकर उन्हें अपना गुरु माना है, इस प्रकार मेरे 24 गुरु हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कपोत, अजगर, सिंधु, पतंग, भ्रमर, मधुमक्खी, गज, मृग, मीन, पिंगला, कुररपक्षी, बालक, कुमारी, सर्प, शरकृत, मकड़ी और भृंगी।


माध्यमिक तंत्र-साहित्य

देवताओं के उपासनासंबंध से तंत्र का भेदनिरूपण संक्षेप में कुछ इस प्रकार होगा-
1. काली (भैरव; महाकाल) के नाना प्रकार के भेद हैं, जैसे, दक्षिणाकाली, भद्रकाली। काली दक्षिणान्वय की देवता हैं। श्यमशान काली उत्तरान्वय की देवता हैं। इसके अतिरिक्त कामकला काली, धन-काली, सिद्धकाली, चंडीकाली प्रभृति काली के भेद भी हैं।
2. महाकाली के कई नाम प्रसिद्ध हैं। नारद , पांचरात्र , आदि ग्रंथों से पता चलता है कि विश्वामित्र ने काली के अनुग्रह से ही ब्रह्मण्य-लाभ किया था। काली के विषय में 'शक्तिसंगम तंत्र' के अनुसार काली और त्रिपुरा विद्या का साद्दश्य दिखाई देता है-
काली त्रिपुरा
एकाक्षरी बाला
सिद्धकाली पंचदशी
दक्षिणाकाली षोडशी
कामकला काली पराप्रसाद
हंसकाली चरणदीक्षा
गुह्मकाली षट्संभव परमेंश्वरी
दस महाविद्यायों में 'संमोहन तंत्र' के अनुसार ये भेद हैं -
वाममार्गी दक्षिणमार्गी
छित्रा बाला, कमला
सुमुखी भुवनेश्वरी, लक्ष्मी, तारा, बगला, सुंदरी, तथा राजमातंगी।
काली के विषय में कुछ प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथों के नाम इस प्रकार हैं-
1. महाकाल संहिता, (50 सहस्रश्लोकात्मक अथवा अधिक)
2. परातंत्र (यह काली विष्यक प्राचीन तंत्र ग्रंथ है। इसमें चार पटल हैं, एक ही महाशक्ति पÏट्सहानारूढा षडान्वया देवी हैं। इस ग्रंथ के अनुसार पूर्वान्वय की अधिष्ठातृ देवी पूर्णोश्वरी, दक्षिणान्वय की विश्वेश्वरी, पूर्वान्य की कुब्जिका, उत्तरान्वय की काली, ऊद्र्धान्वय की श्रीविद्या।)
3. काली यामल; 4. कुमारी तंत्र; 5. काली सुधानिध; 6. कालिका मत; 9. काली कल्पलता; 8. काली कुलार्णव; 5. काली सार; 10 कालीतंत्र; 11. कालिका कुलसद्भाव; 13. कालीतंत्र; 14. । 15. कालज्ञान और कालज्ञान के परिशिष्टरूप में कालोत्तर; 16. काली सूक्त; 17. कालिकोपनिषद्; 18. काली तत्व (रामभटटकृत); 19. भद्रकाली चितामणि; 20. कालीतत्व रहस्य; 21. कालीक्रम कालीकल्प या श्यामाकल्प; 22. कालीऊध्र्वान्वय; 23. कालीकुल; 24. कालीक्रम; 25. कालिकोद्भव; 26. कालीविलास तंत्र; 27. कालीकुलावलि; 28. वामकेशसंहिता; 29. काली तत्वामृत; 30. कालिकार्चामुकुर; 31. काली या श्यामारहस्य (श्रीनिवास कृत); 33. कालिकाक्रम; 34. कालिका ह्रदय; 35. काली खंड (शक्तिसंगम तंत्र का);36. काली-कुलामृत; 37. कालिकोपनिषद् सार; 38. काली कुल क्रमार्चन (विमल बोध कृत); 39. काली सपर्याविधि (काशीनाथ तर्कालंकार भट्टाचार्य कृत); 40. काली तंत्र सुधसिंधु (काली प्रसाद कृत); 41. कुलमुक्ति कल्लोलिनी (अव्दानंद कृत); 24. काली शाबर; 43. कौलावली; 44. कालीसार; 45. कालिकार्चन दीपिका (लगदानंद कृत); 46. श्यामर्चन तरंगिणी (विश्वनाथ कृत); 47. कुल प्रकाश; 48. काली तत्वामृत (बलभद्र कृत); 49. काली भक्ति रसायन (काशीनाथ भट्ट कृत); 50. कालीकुल सर्वस्व; 51. काली सुधानिधि; 52. कालिकोद्रव (?); 53. कालीकुलार्णव; 54. कालिकाकुल सर्वस्व; 56. कालोपरा; 57. कालिकार्चन चंद्रिका (केशवकृत) इत्यादि।
2- तारा : तारा के विषय में निम्नलिखित तंत्र ग्रथ विशेष उल्लेखनीय हैं-
1 तारणीतंत्र; 2. तोडलतंत्र; 3- तारार्णव; 4- नील-तंत्र; 5- महानीलतंत्र; 6- नील सरस्वतीतंत्र; 7- चीलाचार; 8- तंत्ररत्न; 9- ताराशाबर तंत्र; 10- तारासुधा; 11- तारमुक्ति सुधार्णव (नरसिंह ठाकुर कृत); 12- तारकल्पलता; - (श्रीनिवास कृत) ; 13- ताराप्रदीप (लक्ष्मणभट्ट कृत) ; 14- तारासूक्त; 15- एक जटीतंत्र; 16- एकजटीकल्प; 17- महाचीनाचार क्रम (ब्रह्म यामल स्थित) 18- तारारहस्य वृति; 19- तारामुक्ति तरंगिणी (काशीनाथ कृत); 20- तारामुक्ति तरंगिणी (प्रकाशनंद कृत); 21- तारामुक्ति तरंगिणी (विमलानंद कृत); 22- महाग्रतारातंत्र; 23- एकवीरतंत्र; 24- तारणीनिर्णय; 25- ताराकल्पलता पद्धति (नित्यानंद कृत); 26- तारिणीपारिजात (विद्वत् उपाध्याय कृत); 27- तारासहस्स्र नाम (अभेदचिंतामणिनामक टीका सहित); 28- ताराकुलपुरुष; 29- तारोपनिषद्; 30- ताराविलासोदय ) (वासुदेवकृत)।
'तारारहस्यवृत्ति' में शंकराचार्य ने कहा है कि वामाचार, दक्षिणाचार तथा सिद्धांताचार में सालोक्यमुक्ति संभव है। परंतु सायुज्य मुक्ति केवल कुलागम से ही प्राप्य है। इसमें और भी लिखा गया है कि तारा ही परा वग्रूपा, पूर्णाहंतामयी है। शक्तिसंगमतंत्र में भी तारा का विषय वर्णित है। रूद्रयामल के अनुसार प्रलय के अनंतर सृष्टि के पहले एक वृहद् अंड का आविर्भाव होता है। उसमें चतुर्भुज विष्णु प्रकट होते हैं जिनकी नाभि में ब्रह्मा ने विष्णु से पूछा- किसी आराधना से चतुभ्र्वेद का ज्ञान होता है। विष्णु ने कहा रूद्र से पूछो- रूद्र ने कहा मेरू के पश्चिम कुल में चोलह्द में वेदमाता नील सरस्वती का आविर्भाव हुआ। इनका निर्गम रूद्र के ऊध्र्व वस्त्र से है। यह तेजरूप से निकलकर चौलह्रद में गिर पड़ीं और नीलवर्ण धारण किया। ह्रद के भीतर अक्षोभ्य ऋषि विद्यमान थे। यह रूद्रयामल की कथा है।
    
1. षोडशी (श्रीविद्या) : श्रीविद्या का नामांकर है षोडशी। त्रिपुरसंुदरी, त्रिपुरा, ललिता, आदि भी उन्हीं के नाम है। इनके भैरव हैं- त्रिपुर भैरव (देव शक्ति संगमतंत्र)। महाशक्ति के अनंत नाम और अनंत रूप हैं। इनका परमरूप एक तथा अभिन्न हैं। त्रिपुरा उपासकों के सतानुसार ब्रह्म आदि देवगण त्रिपुरा के उपासक हैं। उनका परमरूप इंद्रियों तथा मन के अगोचर है। एकमात्र मुक्त पुरूष ही इनका रहस्य समझ पाते हैं। यह पूर्णाहंतारूप तथा तुरीय हैं। देवी का परमरूप वासनात्मक है, सूक्ष्मरूप मंत्रात्मक है, स्थूलरूप कर-चरणादि-विशिष्ट है। उनके उपासकों में प्रथम स्थान काम (मन्मथ) का है। यह देवी गुहय विद्या प्रवर्तक होने के कारण विश्वेश्वरी नाम से प्रसिद्ध हैं। देवी के बारह मुख और नाम प्रसिद्ध हैं। - यथा, मनु, चंद्र, कुबेर, लोपामुद्रा, मन्मथ, अगस्त्य, अग्नि, सूर्य, इंद्र, स्कंद, शिव, क्रोध भट्टारक (या दुर्वासा)। इन लोगों ने श्रीविद्या की साधना से अपने अधिकार के अनुसार पृथक् फल प्राप्त किया था।
श्रीविद्या के मुख्य 12 संप्रदाय हैं। इनमें से बहुत से संप्रदाय लुप्त हो गए है, केवल मन्मथ और कुछ अंश में लोपामुद्रा का संप्रदाय अभी जीवित है। कामराज विद्या (कादी) और पंचदशवर्णात्मक तंत्र राज, और त्रिपुरउपनिषद के समान लोपामुद्रा विद्या आदि भी पंचदशवर्णात्मक हैं। कामेश्वर अंकस्थित कामेश्वरी की पूजा के अवसर पर इस विद्या का उपयोग होता हैद्य लोपामुद्रा अगस्त की धर्मपत्नी थीं। वह विदर्भराज की कन्या थीं। पिता के घर में रहने के समय पराशक्ति के प्रति भक्तिसंपन्न हुई थीं। त्रिपुरा की मुख्य शक्ति भगमालिनी है। लोपामुद्रा के पिता भगमालिनी के उपासक थे। लोपामुद्रा बाल्यकाल से पिता की सेवा करती थी। उन्होंने पिता की उपासना देखकर भगमालिनी की उपासना प्रारंभ कर दी। देवी ने प्रसन्न होकर जगन्माता की पदसेवा का अधिकार उन्हें दिया थाद्य त्रिपुरा विद्या का उद्धार करने पर उनके नाम से लोपामुद्रा ने ऋषित्व प्राप्त कियाद्। अगस्त्य वैदिक ऋषि थे। बाद में अपनी भार्या से उन्होंने दीक्षा ली।
दुर्वासा का संप्रदाय भी प्राय: लुप्त ही है। श्रीविद्या, शक्ति चक्र सम्राज्ञी है और ब्रह्मविद्या स्वरूपा है। यही आत्मशक्ति है। ऐसी प्रसिद्धि है कि -
यत्रास्ति भोगो न च तत्र मोझो;
यत्रास्ति भोगे न च तत्र भोग:।
श्रीसुंदरीसेवनतत्परानां,
भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।,
            
अगस्त्य केवल तंत्र में ही सिद्ध नहीं थें, वे प्रसिद्ध वैदिक मंत्रों के द्रष्टा थे। श्री शंकरमठ में भी बराबर श्रीविद्या की उपासना और पूजा होती चली आ रही है।
त्रिपुरा की स्थूलमूर्ति का नाम ललिता है। ऐसी किवदंती है कि अगस्त्य तीर्थयात्रा के लिये घूमते समय जीवों के दु:ख देखकर अत्यंत द्रवित हुए थे। उन्होंने कांचीपुर में तपस्या द्वारा महाविष्णु को तुष्ट किया था। उस समय महाविष्णु ने प्रसन्न होकर उनके सामने त्रिपुरा की स्थूलमूर्ति ललिता का माहात्म्य वर्णित किरण जिस प्रसंग में भंडासुर वध प्रभृति का वर्णन था, इसका सविस्तर विवरण उनके स्वांश हयग्रीव मुनि से श्रवण करें। इसके अनंतर हयग्रीव मुनि ने अगस्त्य को भंडासुर का वृत्तांत बतलाया। इस भंडासुर ने तपस्या के प्रभाव से शिव से वर पाकर 105 ब्रह्मांडों का अधिपत्य लाभ किया था। श्रीविद्या का एक भेद कादी है, एक हे हादी और एक कहादी।
श्रीविद्या गायत्री का अत्यंत गुप्त रूप है। यह चार वेदों में भी अत्यंत गुप्त है। प्रचलित गायत्री के स्पष्ट और अस्पष्ट दोनों प्रकार हैं। इसके तीन पाद स्पष्ट है, चतुर्थ पाद अस्पष्ट है। गायत्री वेद का सार है। वेद चतुर्दश विद्याओं का सार है। इन विद्याओं से शक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है। कादी विद्या अत्यंत गोपनीय है। इसका रहस्य गुरू के मुख से ग्रहण योग्य है। संमोहन तंत्र के अनुसार तारा, तारा का साधक, कादी तथा हादी दोनों मत से संश्लिष्ट है। हंस तारा, महा विद्या, योगेश्वरी कादियों की दृष्टि से काली, हादियों की दृष्टि से शिवसुदरी और कहादी उपासकों की दृष्टि से हंस है। श्री विद्यार्णव के अनुसार कादी मत मधुमती है। यह त्रिपुरा उपासना का प्रथम भेद है। दूसरा मत मालिनी मत (काली मत) है। कादी मत का तात्पर्य है जगत चैतन्य रूपिणी मधुमती महादेवी के साथ अभेदप्राप्ति। काली मत का स्वरूप है विश्वविग्रह मालिनी महादेवी के साथ तादात्म्य होना । दोनों मतों का विस्तृत विवरण श्रीविद्यार्णव में है।
गोड़ संप्रदाय के अनुसार श्रेष्ठ मत कादी है, परंतु कश्मीर और केरल में प्रचलित शाक्त मतों के अनुसार श्रेष्ठ मत त्रिपुरा और तारा के हैं। कादी देवता काली है। हादी उपासकों की त्रिपुरसंदरी हैं और कहादी की देवता तारा या नील सरस्वती हैं। त्रिपुरा उपनिषद् और भावनोपनिषद् कादी मत के प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। किसी किसी के मतानुसार कौल उपनिषद् भी इसी प्रकार का है, त्रिपुरा उपनिषद् के व्याख्याकार भास्कर के अनुसार यह उपविद्या सांख्यायन आरणयक के अंतर्गत है।
हादी विद्या का प्रतिपादन त्रिपुरातापिनी उपनिषदद्य में है। प्रसिद्धि है कि दुर्वासा मुनि त्रयोदशाक्षरवाली हादी विद्या के उपासक थे। दुर्वासा रचित ललितास्तव रत्न नामक ग्रंथ बंबई से प्रकाशित हुआ है।
मैंने एक ग्रंथ दुर्वासाकृत परशंमुस्तुति देखा था, जिसका महाविभूति के बाद का प्रकरण है अंतर्जा विशेष उपचार परामर्श। दुर्वासा का एक और स्तोत्र है त्रिपुरा महिम्न स्तोत्र। उसके ऊपर नित्यानंदनाथ की टीका है। सौभाग्यहृदय स्तोत्र नाम से एक प्रसिद्ध स्तोत्र है जिसके रचयिता महार्थमंजरीकार गोरक्ष के परमगुरू हैं। योगिनी हृदय या उत्त्र चतु:शती सर्वत्र प्रसिद्ध है। पूर्व चतु:शती रामेश्वर कृत परशुराम कल्पसूत्र की वृति में है। ब्रह्मांड पुराण के उत्तरखंड में श्री विद्या के विषय में एक प्रकरण हैद्य यह अनंत, दुर्लभ, उत्तर खंड में त्रिशति अथवा ललितात्रिशति नाम से प्रसिद्ध स्तव है जिसपर शंकराचाय्र की एक टीका भी है। इसका प्रकाशन हा चुका है। नवशक्ति हृदयशास्त्र के विषय में योगिनी की दीपिका टीका में उल्लेख है।

  
इस प्रस्थान में सूत्रग्रंथ दो प्रसिद्ध हैं: एक अगस्त्य कृत, शक्ति सूत्र और दूसरा प्रत्यभिज्ञाहृदय नामक शक्तिसूत्र। परशुराम कृतकल्पसूत्र भी सूत्रसाहित्य के अंतर्गत है। यह त्रिपुरा उपनिषद का उपबृंहण है। ऐसी प्रसिद्धि है कि इसपर रामेश्वर की एक वृत्ति है जिसका नाम सौभाग्योदय है एवं जिसकी रचना 1753 शकाब्द में हुई थी। इसका भी प्रकाशन हो चुका है। इस कल्पसूत्र के ऊपर भास्कर राय ने रत्नालोक नाम की टीका बनाई थी। अभी यह प्रकाशित नहीं हुई है। गौड़पाद के नाम से श्रीविष्णुरत्न सूत्र प्रसिद्ध है। इसपर प्रसिद्ध शंकरारणय का व्याख्यान है। यह टीका सहित प्रकाशित हुआ है। सौभग्य भास्कर में त्रैपुर सूक्त नाम से एक सूक्त का पता चलता है। इसके अतिरिक्त एक और भी सूत्रग्रंथ बिंदु सूत्र है। भास्कर ने भावनोपनिषद भाष्य में इसका उल्लेख किया है। किसी प्राचीन गंथागार में कौल सूत्र, का एक हस्तलिखित ग्रंथ दिखाई पड़ा था जो अभी तक मुद्रित नहीं हुआ है।
स्तोत्र ग्रंथें में दुर्वासा का ललितास्तव ग्रंथ प्रसिद्ध है। इसका उल्लेख ऊपर किया गया है। गौड़पाद कृत सौभाग्योदय स्तुति आदि प्रसिद्ध ग्रंथ हैं जिनपर शंकराचार्य की टीकाएँ मिलती हैं। ऐसा कहा जाता है कि सौभाग्योदय के ऊपर लक्ष्मीधर ने भी एक टीका लिखी थी। सौभाग्योदय स्तुति की रचना के अनंतर शंकरार्चा ने सौंदर्य लहरी का निर्माण किया जो आनंदलहरी नाम से भी प्रसिद्ध है। इनके अतिरिक्त ललिता सहस्र नाम एक प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसपर भास्कर की टीका सौभाग्य भास्कर (रचनाकाल 1729 ई0) है। ललिता सहस्रनाम के ऊपर काशीवासी पं0 काशीनाथ भट्ट की भी एक टीका थी। काशीनाथ भट्ट दीक्षा लेने पर शिवानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए। उनकी टीका का नाम नामार्थ संदीपनी है।
श्री विद्यार्णव के अनुसार कादी या मधुमती मत के मुख्य चार ग्रंथ हैं- तंत्रराज, मातृकार्षव, योगिनीहृदय नित्याषोडशार्णव और वामकेश्वर वस्तुत: पृथक ग्रंथ नहीं हैं, एक ग्रंथ के ही अंशगत भेद हैं। इसी प्रकार बहुरूपाष्टक एक पुस्तक नहीं है। यह आठ पुस्तकों की एक पुस्तक है।
तंत्रराज के पूर्वार्ध और उत्तरार्ध दो भाग हैं। 64 तंत्रों के विषय जहाँ सौंदर्यलहरी में आए हैं उस स्थल में इस विषय में चर्चा की गई है जिससे पता चलता है कि (विशेषत: लक्ष्मीघर की टीका में) मतांतर तंत्र राजटीका मनोरमा का मत प्रतीत होता है।
भास्कर राय ने सेतुबंध में भी आलोचना प्रस्तुत की है। तंत्र राज में जो नित्याहृदय की बात कही गयी है वह वस्तुत: योगिनीहृदय का ही नामांतर है। यह वामकेश्वर तंत्र का उत्तरार्ध है। नित्याहृदय इत्येतत् तंत्रोत्तरार्धस्य योगिनी हृदयस्य संज्ञा।
ऐसा प्रतीत होता है कि दो मतों के कारण दो विभाग हैं। वर्णसम और मंत्रसम के नाम पर ये नाम है। क, ह, ये महामंत्र उत्त्रान्वय के हैं। ककार से ब्रह्मरूपता है। यह कादी मत है। हकार से शिवरूपता, हादी मत है। कादी मत, काली मत और हादी मत सुंदरी मत हैं। दोनों मिलकर कहादी मत होता है। सुंदरी में प्रपंच है। जो सुंदरी से भिन्न है उसमें प्रपंच नहीं है। सौंदर्य सवदर्शन है। ब्रह्मसंदर्शन का अर्थ है असौंदर्य का दर्शन। 58 पटल में है कि भगवती सुंदरी कहती हैं- अहं प्रपंचभूताऽस्मि, सा तु निर्णुणारूपिणी (शक्ति संगमतंत्र, अध्याय 58)। कोई कोई कहते हैं कि कादी, हादी और कहादी आदि भेदों से तंत्रराज के कई भेद हैं। योगिनीहृदय सुप्रसिद्ध ग्रंथ है। यह वामकेश्वर तंत्र का उत्तर चतु:शती है। भास्कर राय ने भावनोपनिषद के भाष्य में कहा है कि यह कादी मतानुयायी ग्रंथ है। तंत्रराज की टीका मनोरमा में भी यही बात मिलती है परंतु बरिबास्य रहस्य में है कि इसकी हादी मतानुकृल व्याख्या भी वर्तमान है। योगिनी हृदय ही नित्याहृदय के नाम से प्रसिद्ध है।
श्रीविद्या विषयक कुछ ग्रंथ ये हैं-

1. तंत्रराज- इसकी बहुत टीकाएँ हैं। सुभगानंदनाथ कृत मनोरमा मुख्य है। इसपर प्रेमनिधि की सुदर्शिनी नामक टीका भी है। भाष्स्कर की और शिवराम की टीकाएँ भी मिलती हैं।
2. तंत्रराजोत्तर
3. परानंद या परमानंद तंत्र - किसी किसी के अनुसार यह श्रीविद्या का मुख्य उपासनाग्रंथ है। इसपर सुभगानंद की सुभगानंद संदोह नाम्नी टीका थ। कल्पसूत्र वृत्ति से मालूम होता है कि इसपर और भी टीकाएँ थी।
4. सौभाग्य कल्पद्रुम परमानंद के अनुसार यह श्रेक्ष्ठ ग्रंथ है।
5. सौभाग्य कल्पलतिका क्षेमानंद कृत।
6. वामकेश्वर तंत्र (पूर्वचतु:शती और उत्तर चतु:शती) इसपर भास्कर की सेतुबंध टीका प्रसिद्ध है। जयद्रथ कृत वामकेश्वर विवरण भी है।
7. ज्ञानार्णव- यह 26 पटल में है।
8-9. श्री क्रम संहिता तथा वृहद श्री क्रम संहिता।
10. दक्षिणामूर्त्ति संहिता - यह 66 पटल में है।
11. स्वच्छंद तंत्र अथवा स्वच्छंद संग्रह।
12. कालात्तर वासना सौभाग्य कल्पद्रुप में इसकी चर्चा आई है।
13. त्रिपुरार्णव। 14. श्रीपराक्रम: इसका उल्लेख योगिनी-हृदय-दीपका में है।
15. ललितार्चन चंद्रिका - यह 17 अध्याय में है।
16. सौभाग्य तंत्रोत्तर। 17. मातृकार्णव
18. सौभाग्य रत्नाकर: (विद्यानंदनाथ कृत)
19. सौभाग्य सुभगोदय - (अमृतानंदनाथ कृत)
20. शक्तिसंगम तंत्र- (सुंदरी खंड)
21. त्रिपुरा रहस्य - (ज्ञान तथा माहात्म्य खंड)
22. श्रीक्रमात्तम - (निजपकाशानंद मल्लिकार्जुन योगींद्र कृत)
23. अज्ञात अवतार - इसका उल्लेख योगिनी हृदय दीपिका में हैं।
24-25. सुभगार्चापारिजात, सुभगार्चारत्न: सौभाग्य भास्कर में इनका उल्लेख है।
26. चंद्रपीठ
27. संकेतपादुका
28. सुंदरीमहोदय - शंकरानंदनाथा कृत
29. हृदयामृत- (उमानंदनाथ कृत)
30. लक्ष्मीतंत्र: इसें त्रिपुरा माहात्म्य है।
31. ललितोपाख्यान - यह ब्रह्मांड पुराण के उत्तरखंड में है।
32. त्रिपुरासार समुच्चय (लालूभट्ट कृत) 33. श्री तत्वचिंतामणि (पूर्णानंदकृत)
34. विरूपाक्ष पंचाशिका 35. कामकला विलास 36. श्री विद्यार्णव
37. शाक्त क्रम (पूर्णानंदकृत)
38. ललिता स्वच्छंद
39. ललिताविलास
40. प्रपंचसार (शंकराचार्य कृत)
41. सौभाग्यचंद्रोदय (भास्कर कृत)
42. बरिबास्य रहस्य: (भास्कर कृत)
43. बरिबास्य प्रकाश (भास्कर कृत)
44. त्रिपुरासार
45. सौभाग्य सुभगोदय: विद्यानंद नाथ कृत
46. संकेत पद्धति
47. परापूजाक्रम
48. चिदंबर नट।
तंत्रराज (कादीमत) में एक श्लोक इस प्रकार है- नित्यानां शोडषानां च नवतंत्राणिकृत्स्नस:। सुभगानंद नाथ ने अपनी मनोरमा टीका में कहा है- इस प्रसंग में नवतंत्र का अर्थ है- सुंदरीहृदय। चंद्रज्ञान, मातृकातंत्र, संमोहनतंत्र, मावकेश्वर तंत्र, बहुरूपाष्टक, प्रस्तारचिंतामणि के समान इसे समझना चाहिए। इस स्थल में सुंदरीहृदय का योगिनीह्रदय से तादात्म्य है। वामकेश्वर आदि तंत्रग्रंथों का पृथक् पृथक् उल्लेख भी हुआ है। नित्याषोडशार्णव में पृथक् रूप से इसका उल्लेख किया गया है, परंतु अन्य नित्यातंत्रों के भीतर प्रसिद्ध श्रीक्रमसंहिता और ज्ञानार्णव के उल्लेख नहीं है।
दस महाविद्या: इस महाविद्याओं में पहली त्रिशक्तियों का प्रतिष्ठान जिन ग्रंथों में है उनमें से संक्षेप में कुछ ग्रंथों के नाम ऊपर दिए गए हैं। भुवनेश्वरी के विषय में भुवनेश्वरी रहस्य मुख्य ग्रंथ है। यह 26 पटलों में पूर्ण है। पृथ्वीधराचार्य का भुवनेश्वरी अर्चन पद्धति एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। ये पृश्रवीधर गांविंदपाद के शिष्य शंकराचार्य के शिष्य रूप से परिचित हैं। भुवनेश्वरीतंत्र नाम से एक मूल तंत्रग्रंथ भी मिलता हैं। इसी प्रकार राजस्थान पुरात्तत्व ग्रथमाला में पृथ्वीधर का भुवनेश्वरी महास्तोत्र मुद्रित हुआ है।
भैरवी के विषय में भैरवीतंत्र' प्रधान ग्रंथ है। यह प्राचीन ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त भैरवीरहस्य , भैरवी सपयाविधि आदि ग्रंथ भी मिलते हैं। पुरश्चर्यार्णव नामक ग्रंथ में भैरवी यामल का उल्लेख है।
भैरवी के नाना प्रकार के भेद हैं- जैसे, सिद्ध भैरवी, त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, षटकुटा भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी, इत्यादि। फ़ सिद्ध भैरवीफ़ उत्तरान्वय पीठ की देवता है। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवता है। नित्या भैरवी पश्चिमान्वय की देवता है। भद्र भैरवी महाविष्णु उपासिका और दक्षिणासिंहासनारूढा है। त्रिपुराभैरवी चतुर्भुजा है। भैरवी के भैरव का नाम बटुक है। इस महाविद्या और दशावतार की तुलना करने पर भैरवी एवं नृसिंह को अभिन्न माना जाता है।
'बगला का मुख्य ग्रंथ है - सांख्यायन तंत्र । यह 30 पटलों में पूर्ण है। यह ईश्वर और क्रौंच भेदन का संबंद्ध रूप है। इस तंत्र को षट् विद्यागम कहा जाता है। बगलाक्रम कल्पवल्ली नाम से यह ग्रंथ मिलता है जिसमें देवी के उद्भव का वर्णन हुआ है। प्रसिद्धि है कि सतयुग में चारचर जगत् के विनाश के लिये जब वातीक्षीम हुआ था उस समय भगवान् तपस्या करते हुए त्रिपुरा देवी की स्तुति करने लगे। देवी प्रसन्न होकर सौराष्ट्र देश में वीर रात्रि के दिन माघ मास में चतुर्दशी तिथि की प्रकट हुई थीं। इस वगलादेवी को त्रैलोक्य स्तंभिनी विद्या जाता है।
घूमवती के विषय में विशेष व्यापक साहित्य नहीं है। इनके भैरव का नाम कालभैरव है। किसी किसी मत में घूमवती के विधवा होने के कारण उनका कोई भैरव नहीं है। वे अक्ष्य तृतीया को प्रदीप काल में प्रकट हुई थीं। वे उत्तरान्वय की देवता हैं। अवतारों में वामन का धूमवती से तादात्म्य है। धूमवती के ध्यान से पता चलता है कि वे काकध्वज रथ में आरूढ़ हैं। हस्त में शुल्प (सूप) हैं। मुख सूत पिपासाकातर है। उच्चाटन के समय देवी का आवाहन किया जाता है। फ़ प्राणातोषिनीफ़ ग्रंथ में धूवती का आविर्भाव दर्णित हुआ है।
मातंगी का नामांतर सुमुखी है। मातंगी को उच्छिष्टचांडालिनी या महापिशाचिनी कहा जाता है। मातंगी के विभिन्न प्रकार के भेद हैं-
उच्छिष्टमातंगी, राजमांतगी, सुमुखी, वैश्यमातंगी, कर्णमातंगी, आदि। ये दक्षिण तथा पश्चिम अन्वय की देवता हैं। ब्रह्मयामल के अनुसार मातंग मुनि ने दीर्घकालीन तपस्या द्वारा देवी को कन्यारूप में प्राप्त किया था। यह भी प्रसिद्धि है कि धने वन में मातंग ऋषि तपस्या करते थे। क्रूर विभूतियों के दमन के लिये उस स्थान में त्रिपुरसुंदरी के चक्षु से एक तेज निकल पड़ा। काली उसी तेज के द्वारा श्यामल रूप धारण करके राजमातंगी रूप में प्रकट हुईं। मातंगी के भैरव का नाम सदाशिव है। मातंगी के विषय में मातंगी सपर्या , रामभट्ट का मातंगीपद्धति शिवानंद का मंत्रपद्धति है। मंत्रपद्धति सिद्धांतसिधु का एक अध्याय है। काशीवासी शंकर नामक एक सिद्ध उपासक सुमुखी पूजापद्धति के रचयिता थे। शंकर सुंदरानंद नाथ के शिष्य (छठी पीढ़ी में) प्रसिद्ध विद्यारणय स्वामी की शिष्यपरंपरा में थे।
श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफ़णीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरूं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करूणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ।। 1 ।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽ स्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंग्ङव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरू मानसं च ।। 2 ।।
अतुलितबलधमं  हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणानिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि. ।। 3 ।।
जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फ़ल खाई ।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हियँ धरि रघुनाथा ।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ।।
जेहिं गिरि चरन देइ  हनुमंता ।  चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ।।
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श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफ़णीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरूं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करूणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ।। 1 ।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽ स्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंग्ङव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरू मानसं च ।। 2 ।।
अतुलितबलधमं  हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणानिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि. ।। 3 ।।
जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फ़ल खाई ।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हियँ धरि रघुनाथा ।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ।।
जेहिं गिरि चरन देइ  हनुमंता ।  चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी ।।
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श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
सुन्दरकाण्ड
श्लोक
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफ़णीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरूं मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करूणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम् ।। 1 ।।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽ स्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंग्ङव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरू मानसं च ।। 2 ।।
अतुलितबलधमं  हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणानिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि. ।। 3 ।।
जामवंत के बचन सुहाए । सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई । सहि दुख कंद मूल फ़ल खाई ।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी । होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा । चलेउ हियँ धरि रघुनाथा ।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर । कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ।।
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवनतनय बल भारी ।।
जेहिं गिरि चरन देइ  हनुमंता ।  चलेउ सो गा पाताल तुरंता ।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । एही भाँति चलेउ हनुमाना ।।
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